तलाश – एक जासूसी कहानी Update 2 – Jasoosi Sexy Kahani

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तलाश – एक जासूसी कहानी Update 2 – Jasoosi Sexy Kahani

शाम को चोपड़ा के बंगले पर अर्जुन पहुंचा और उसने अपनी फॉर्चून कार उसके पोर्च में जाकर रोकी. अर्जुन और मोना कार से उतरे तो उनकी नज़र पोर्च में आगे पहले से खड़ी 2 इंपोर्टेड कार्स पे पड़ी, जिनमें से एक काले रंग की ऑडी थी, तो दूसरी लाल रंग की बेंट्ली. अभी वो दरवाजे की ऑर आगे भी देने की सोच ही रहे थी, की बंगले की मैं बिल्डिंग से उन्हें एक नौकर अपनी ऑर आता हुआ दिखा. नौकर उनके पास आकर रुका और बोला “राम राम साहब” और सवालिया निगाहों से उन्हें देखने लगा.

“राम राम” अर्जुन ने कहा, और फिर पूछा “चोपड़ा साहब घर पे है?”

“जी नहीं, बारे साहब तो सुबह से ही घर पे नहीं है” उस नौकर ने सम्मान भरे स्वर में कहा

“श… तुम्हारा नाम क्या है?”

“जी रमेश”

“रमेश… बाबूराम घर पे है क्या?”

“जी हां सब”

“हमें उसी से बात करनी है. क्या तुम हमें उसके पास तक ले चलेंगे”

“जरूर सब. आइये” कहकर नौकर वापिस मैं बिल्डिंग की ऑर मुड़ा और अर्जुन को अपने साथ आने का इशारा करते हुए आगे बाद गया.

अर्जुन और मोना उसके पीछे चलते हुए एक आलीशान और भावी ड्रॉयिंग रूम में पहुंचे, जहां की हर चीज़ ना सिर्फ़ इंपोर्टेड बल्कि बहुत ही महेंगी भी जान पड़ती थी.

“आप लोग बैठिए साहब, में बाबूराम को बुलाके लाता हूँ” कहकर नौकर वहां से चला गया.

नौकर के जाने से बाद अर्जुन ने मज़ाक के मूंड़ में आते हुए, मोना को छेड़ने के लिहाज़ से कहा “देख लो मैडम जी .. तुम हे सोसाइटी, हे सोसाइटी की माला जपती रहती हो ना ….. यह है बारे लोगों की जिंदगी. इतना बड़ा घर है चोपड़ा का, लेकिन आज अपना कहने वाला कोई भी नहीं उसके पास. ना जाने कितने पैसे खर्च और वक्त खर्चा करके बनाया गया यह महल आज नौकरों के आराम फरमाने के काम आ रहा है. देख लो, कभी कभी पैसा ही इंसान का सबसे बड़ा दुश्मंन बन जाता है”

मोना उसकी बात को समझते हुए बोली “आप ठीक कह रहे है सर. कभी कभी हद से ज्यादा पैसा होना भी जिंदगी के लिए नुकसान-दायक साबित होता है. जब रिश्तों से ज्यादा एहमियत हम पैसे हो देते है , तो अंजाम चोपड़ा जैसे लोगों की तरह होता है.” मोनाके लहज़े में अचानक नफरत का पुट उभरने लगा था “शायद इस हादसे के बावजूद भी उसने कुछ सीखा नहीं है. इसलिए तो अपनी बेटी की चिंता करने, या हमारा इंतजार करने की जगह शायद वो अपने ऑफिस में बैठा, इस वक्त भी पैसे कमा रहा होगा. ह्म्‍म्म्म… उसी लग रहा होगा की हमें अपायंट करके उसने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी”

“क्या किया जाए मेमसाहेब .. अपने अपने फंदे है जीने के” अर्जुन ने लापरवाही से कंधे उचकाए और अपनी जेब से सिगरेट निकालके सुलगाने लगा.

तभी रूम में 45-50 साल के एक आदमी ने कदम रखा. बदन पे कीमती सूट, पैरों में चमकते जूते और शानदार पर्सनॅलिटी वाला वो शॅक्स चलता हुआ अर्जुन के पास आया और बोला “कहिए. में आपकी क्या मदद कर सकता हूँ”

अर्जुन ने एक पल उस आदमी को ऊपर से नीचे तक देखा और बोला “जी हम यहां बाबू से मिलने आइये है. अगर आप उसी बुला दे तो बड़ी मेहरबानी होगी हुज़ूर” अर्जुन बेशक उसकी पर्सनॅलिटी से इंप्रेस हुआ था, लेकिन यह उसका खास अंदाज़ था, की जब भी वो अंदर से गंभीर होता था, तो चेहरे से लापरवाही झलकने लगती थी उसके. अभी भी ऐसा ही था. वो इस वक्त केस को लेकर काफी सीरीयस था. लेकिन साथ ही अपनी मज़ाक करने की आदत से मजबूर था

वो शॅक्स मुस्कुराते हुए बोला “जी मेरा ही नाम बाबू है.”

उसकी बात सुनकर एक पल के लिए अर्जुन उसी ऐसे घूरने लगा जैसे कोई वो कोई दूसरे लोक का प्राणी हो. “क्यों दिन दहाड़े हार्ट-अटॅक देने पर तुले हो इस गरीब जान को मियाँ.” अर्जुन ने हैरानी जताते हुए कहा “हमने तो सुना था, बाबू यहां का नौकर है. लेकिन तुम तो किसी भी एंगल से मालिक से कम नहीं लग रहे हो”

“हाहाहा” बारे ही शिस्त ढंग से हंसा बाबू, और फिर बोला ” इसमें आपकी कोई गलती नहीं है. पहली बार मिलने वाला हर शॅक्स, मुझे देखकर चक्करा ही जाता है. लेकिन आपने सुना होगा, इंसान जिस संगत में रहता है .. वैसा ही बन जाता है. में बचपन से ही चोपड़ा साहब के घर में रहा हूँ. इसीलिए थोड़ी बहुत पढ़ाई लिखाई भी सीख गया, उसके बाद जबसे दिव्या बेटी की देख-भाल करने लगा, तबसे पूरा अँग्रेज़ी बाबू बन गया. आपके सामने खड़ा यह अँग्रेज़ी बाबू दिव्या बेटी की ही देन है” उसने बारे ही मीठे लहज़े में कहा.

अर्जुन और मोना के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान रेंग गयी. “वैसे प्यारेलाल ..” अर्जुन की यह एक और आदत थी, वो लोगों के नाम को तोड़-मरोड़ के बोलता था “तुम्हें देखकर लगता है, तहज़ीब के साथ साथ पैसे की गंगा भी तुम्हारी ऑर बहने लगी है इस घर से निकलकर” अर्जुन ने एक बहुत गंभीर सवाल को अपने मज़ाकिया लहज़े में बँधके पूछा

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बाबू भी उसकी मंशा समझते हुए बोला “जी आपकी सोच बिलकुल दुरूस्त है. जबसे दिव्या बेटी की देखभाल की जिम्मेदारी बारे साहब ने मुझे सौंपी थी, तबसे पैसों के लिए उन्होंने कभी मेरा हाथ नहीं रोका. चाहे दिव्या बेटी से आंटी गू या साहब से, पैसे मुझे जीतने चाहिए मिल जाते है.” फिर बाबू रुका और एक नज़र अर्जुन को देखकर बोला “वैसे आप अभी तक मुझसे पूछे जा रहे है, आपने अपनी तारीफ में कुछ अर्ज़ नहीं किया”

“तारीफ उस खुदा की प्यारेलाल, जिसने यह जहाँ बनाया.. जिसने तुम्हें बाबू और इस ना-चीज़ को प्राइवेट डीटेक्टिव अर्जुन बनाया” अर्जुन ने सिगरेट का काश लेते हुए कहा

“आस….” बाबू चौक्कर बोला “मैंने तो सोचा था प्राइवेट डीटेक्टिव साहब कोई किया से, बुड्ढे ख़ूसट टाइप आदमी होंगे… लेकिन आप तो माशा अल्लाह काफी जवान है अर्जुन बाबू”

“हम .. ऊपर वाले की इनायत है … वैसे लगता है तुम्हें हमारे आने की खबर पहले से थी? क्यों प्यारेलाल”

“जी हां” गंभीर होता हुआ बोला बाबू “चोपड़ा साहब ने दोपहर को मुझे फोन करके आपके आने की सूचना दी थी”

“फिर तो यह भी बताया होगा की हम दिव्या के बारे में तुमसे जानकारी लेने आइये है” अर्जुन ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा

“जी हां” इस बार बाबू का चेहरा और आवाज़, दोनों में उदासी की झलक महसूस ही अर्जुन ने.

“तो फिर सीधा काम की बात पे आते है प्यारेलाल” अर्जुन ने कहा “क्या तुम्हें कोई अंदाज़ा है दिव्या कहा गयी होगी बाबू?”

बाबू ने अर्जुन पे एक नज़र डाली, और फिर मोना को देखते हुए बेचैनी से पहलू बदला. उसकी आँखों में इस वक्त अर्जुन को परेशानी के साथ साथ एक अजीब सी कशमकश दिखने लगी. जैसे वो कुछ कहना चाहता हो, लेकिन कहे या नहीं इस बात का फैसला ना कर पा रहा हो. अपनी सीधी सी बात का जवाब ना मिलता देख, अर्जुन को बड़ा अजीब सा लगा, जैसे दाल में कुछ काला हो.

“तुमने कुछ बताया नहीं प्यारेलएल. किस सोच में डूब गये?” अर्जुन ने उसकी आँखों में आँखें डालते हुए कहा

अपने चेहरे के भाव को छुपाने की नाकाम कोशिश करते हुए बाबू बोला “में नहीं जानता. इस बारे में कोई अंदाज़ा नहीं मुझे”

अर्जुन उसकी बात सुनकर मुस्करा पड़ा. वो समझ गया था की बाबू कोरा झूठ बोल रहा है. वो यक़ीनन कुछ जानता है जिसे छुपा रहा है. लेकिन चेहरे से नॉर्मल रहते हुए बोला “दिव्या के इस तरह अचानक चले जाने की वजह बता सकते हो”

“जी नहीं” आँखें चुराते हुए बाबू बोला.

“उससे मिलने कौन कौन आता था? किन किन लोगों के साथ उसका उतना बैठना था?”

“में किसका नाम पता तो नहीं जानता, लेकिन शकल देखने पर जरूर पहचान लूँगा” इस बार भी बाबू ने अर्जुन से नजरें नहीं मिलाई.

“क्या दिव्या शराब. सिगरेट या कोई और तरह का नशा करती थी?”

“जी कभी नहीं. दिव्या बेटी इन सब चीज़ों से कोसों दूर थी”

“क्यों भाई प्यारेलाल? क्या आज झूठ बोलने की कसम खाइए बैठे हो?”

इस बात पे बाबू खामोश रहा. “लगता है मौन व्रत भी है आज तुम्हारा.” अर्जुन एक पल के लिए कुछ सोचने के लिए रुका और फिर उसी घूरते हुए बोला “चलो, कॅम से कॅम दिव्या का कमरा तो दिखाओ हमें, और अब यह ना कहना की पैरों में मेंहदी लगी हुई है. और जब तक हम कमरे से वापिस आते है, आराम से सोच लो की हमारे सवालों का सही जवाब कैसे देना है” कहते हुए अर्जुन खड़ा हुआ

बाबू भी खामोशी से खड़ा हुआ और मोनाओर अर्जुन को दिव्या के कमरे में छोड़कर चुप चाप बाहर निकल गया. “सरजी, आज तो आपका यह पत्ता मुंह पे टेप लगाइए बैठा है.” बाबू के रूम से जाने के बाद मोनबोली.

“ह्म्‍म्म्म” दिव्या के शानदार कमरे पर एक नज़र डालते हुए अर्जुन बोला “लेकिन जानता बहुत कुछ है. इसलिए मुंह तो इस प्यारेलाल का खुलवाना ही पड़ेगा मैडम जी. और तुम तो जानती हो की अर्जुन थे ग्रेट जब कुछ करने की ठान लेता है तो उसी पूरा करके ही छोडता है” अर्जुन अपने पुराने अंदाज़ में लौटते हुए बोला.

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