हॉंटेड – मुर्दे की वपसी – 285

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मैंने ख़ान की लाश को उठाया और तरफ चला उस तरफ…..

मुझे पता नहीं था की ऐसा कुछ होगा , में ये भी नहीं जनता था की में इतनी आगे आऊंगा और इस हालत में खड़ा मिलूँगा लेकिन अब में हूँ और अब मुझे यहाँ से सिर्फ़ एक ही चीज़ सोचनी है और वो है इस बुराई की ताक़त को इसके असली अंजाम तक पहुँचने की . मैंने ख़ान की लाश को उठाया और वो मेरे हाथों में आसानी से लाइट गया क्यों की में जनता था की उसकी शक्ति उसकी रूह है और फिलहाल उसकी रूह में ताक़त नहीं.

मैंने ख़ान की लाश की तरफ देखा और उसे लेकर उस तरफ तरफ चला जहाँ उसे बहुत पहले पहुँच जाना चाहिए था….

बाबा :- ” अगर तूने भूल भुलैया को पार कर भी लिया तब भी जीत तेरे से कोसों दूर होगी… ”

” क्यों … ऐसा क्या करना होगा आगे.. ”

बाबा :- ” वही जो आज से पहले कोई नहीं कर पाया , उस चीज़ को आज तक कोई पार नहीं कर पाया .. ”

” ऐसी क्या चीज़ है वो जिसे आज तक कोई पार नहीं कर पाया… ” मैंने अचांबित स्वर में सवाल किया और मुझे देख बाबा हल्का सा मुस्कराए.

बाबा :- ” तेरी जीत का आखिरी पड़ाव जिसे तू अगर नहीं पा सका तो तेरी हर ख्वाहिश सिर्फ़ ख्वाब बन के रही जाएगी. तेरी क्या बल्कि जिसकी जिंदगी अब वक्त में खत्म हो चुकी है वो फिर से वापिस आ जाएगी. इसलिए तुझे उस आखिरी पड़ाव को हर हालत में पार करना ही पड़ेगा लेकिन तेरे लिए परेशानी ये है की वो कोई साधारण चीज़ नहीं है , उस बैठक तक पहुंचने के लिए तुझे उस दर्द को जीना पड़ेगा , उस दर्द को तुझे तब तक सहना पड़ेगा जब तक तुझे मंजिल नहीं मिल जाती चाहे वो तेरे हर दर्द को तेरे सामने ला खड़ा कर दे , तेरी हिम्मत को तोड़ दे , तुझे तोड़ दे तब तक तू अपने और उसके प्यार को टूटने नहीं देगा… ” बाबा ने आसमान की तरफ हाथ करते हुए बारे खराश और जज़्बे के साथ अपनी बात कही और बादलों से घिरे आसमान में बिज़लियान ‘ कद-कद ‘ कड़कड़ने लगी….

मेरी आँखों के सामने वही चीज़ थी जिसके बारे में बाबा ने बताया था . ज़मीन पे जलते कोयले की एक चादर जिस के दूसरी और वो पठार की एक बैठक बनी हुई थी , जाने ये कौन सी माया थी जो इस धरती पर टिकी हुई थी. एक तरफ ये जलते कोयले की चादर जो कभी नहीं भहुजती और दूसरी तरफ वो सामने सिर्फ़ एक मामूली पठार से बनी बैठक.

” ऐसा कैसा हो सकता है की वो कोयले की चादर कभी नहीं भहुजती.. ” में इस बात को मान ही नहीं पा रहा था.

बाबा :- ” कुछ चीज़ें ऐसी होती है लड़के जो सिर्फ़ इस कुदरत के पास होती है वैसे भी तुझे अब इन सब के बारे में सोचना जरूरी नहीं बल्कि वो जानना जरूरी है जो तू असलियत में महसूस करेगा.. ”

” और वो क्या है.. ” मेरे पूछते ही बाबा मेरी तरफ देखते हुए अपनी आँखें हल्की हल्की मिचने लगे.

” बेटाशाह दर्द……….. ”

मैंने अपने जुटे उतार दिए और एक लंबी सांस भारी अपने आप को तैयार करने के लिए क्यों की में जनता था सामने पैर रखते ही पैरों में बेहद जलन होगी . एक बार मैंने पीछे घूम के देखा जहाँ भाई अभी उसी तरह चीख रहा था. मैंने वापिस अपनी नजरें सामने की और हिम्मत को थामे रख कर अपना पैर उठाया और उस कोयले की चादर के उप्पर रख दिया और फिर ….

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जैसे ही पैरों ने उस तपती आग को महसूस किया उसी पल एक ऐसी जलन और ऐसा दर्द शरीर के अंदर दौड़ा की वो मुझसे बर्दाश्त ही नहीं हुआ.

” आआआआहह–हे ” चीखते हुए अपने पैर को पीछे खींच लिया और दर्द में गहरी गहरी साँसें लेने लगा . में नहीं जनता था की इतना दर्द होगा , एक पल में इतनी तकलीफ होगी . मैंने अपने पैर की तरफ देखा जिसकी टावचा जल कर लाल को चुकी थी . एक ही पल में इतना दर्द , इतनी तकलीफ महसूस हुई थी की उसने हिम्मत ही तोड़ दी ‘ ये मुझसे नहीं हो पाएगा , इतनी तकलीफ मेरा शरीर नहीं झेल पाएगा… ‘ मान में उठते सवाल से में घबरा गया , समझ ही नहीं आया की अब क्या करूँ.

पर जहाँ सोचने का वक्त ना हो वहाँ सोचने में वक्त बिताना ही हार का कारण बन जाता है…

तेज चलती हवाएं और वक्त का बदलना आगे बढ़ते हुए अपने असली रूप और भयानक वक्त में पहुँचता जा रहा था , वक्त के टूटते हुए टुकड़े आपस में जुड़ने शुरू हो चुके थे और एक ऐसा वक्त बना रहे थे जो सिर्फ़ काले अंधेरे से भरा था , वो वक्त जो इस शैतान ने खुद बनाया था , या फिर ये कहूँ की वो वक्त बना ही सिर्फ़ इस शैतान के लिए था जो इस वक्त ज़मीन पर पड़ा दर्द में चिल्ला रहा था.

वो दर्द मेरे लिए सहना बेहद ही मुश्किल था , एक हिम्मत बिखर रही थी की में ये नहीं कर सकता तभी मैंने अपनी नजरें आंशिका की तरफ मोदी जो अपने आने वाले हर पल से अंजान हुई बेसुध हुए पड़ी थी . उसकी तरफ देखते हुए मुझे अपने पर ही घुसा आ रहा था क्यों की में जनता था की आज जब मौका है मुझे उसे सही सलंत रखने का तो वो भी में नहीं कर पा रहा. सिर्फ़ वही नहीं बल्कि आज तो सभी के प्यार की उमीदें सिर्फ़ इसी पल से जुड़ी थी जिस पल के अंदर में बिना कुछ करे बस खड़ा था , सच कहूँ तो मेरे अंदर एक डर ने जन्म ले लिया था की में ये अब नहीं कर पाऊँगा , नहीं चल पाऊँगा इसपर…..

पर तभी आंटी की कही एक बात याद आई की , ‘ जब भी डर लगे श्रेयस तो अपनी आँखें बंद करना और फिर सिर्फ़ उसके बारे में सोचना जिसे तुम बेहद प्यार करते हो फिर देखना डर तुम्हारे अंदर कहीं खो सा जाएगा…. ‘ शायद मुझे इस बात की बेहद जरूरत थी आंटी के इस एहसास की बहुत जरूरत थी , मेरे जीवन में बहुत से ऐसे शॅक्स हैं जिन्हें में बेहद प्यार करता हूँ शायद मुझे उसी एक प्यार के साथ की जरूरत थी. मैंने अपनी आँखें बंद की और जैसे ही बंद की आँखों के सामने एक नहीं , दो नहीं , तीन नहीं बल्कि कई चेहरे सामने आ गये , अंकल , आंटी , भाई शिप्ली आंटी , मेरे सभी दोस्त , सिरर्स्ष्टी और आंशिका….

सबके चेहरे सामने आते ही मैंने अपनी आँखें खोली और फिर बिना कुछ सोचे अपने पैर उठाए और कोयले की उस चादर पर जा खड़ा हुआ.

पैरों के नीचे तपाट पड़ते ही शरीर में जो दर्द दौड़ा उसकी आवाज़ मेरे मुंह से निकली ” आआआआआअहह… ” आज से पहले शायद ही में इतनी जोरों से चीखा होगा , गॅल की नस उभर के गॅल को चीरते हुए बाहर निकल जाने के लिए बेताब थी. आँख से आँसू साइड से फिसलता हुआ नीचे गिर गया पर में इस बार अपनी जगह से पीछे नहीं हटा.

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