हॉंटेड – मुर्दे की वपसी – 292

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” श्रेयस….. ” आंशिका ने मुझे कस लिया मानो वो मुझे चोदना ही नहीं चाहती हो , ” क्यों गोद… क्यों…. ” वो आसमान में देखते हुई चिल्लाई पर क्या फायदा था , उसने रोते हुए फिर अपना सर मेरे सर के उप्पर रख लिया और रोती रही अपने दर्द को किसी तरह कम करने की कोशिश करती रही पर ये तो ऐसा दर्द था जो कभी कम नहीं होना था. आँख से आँसू बहते गये अपने प्यार को इस बार आँखों के सामने से दूर जाता हुआ देख …..

” प्लीज़… नो… प्लेआससे….. आन्न्‍नननननननननणणन्….. ” वो मेरे सर पर अपना सर रख अपनी जिंदगी के सबसे बारे दर्द को महसूस करती गयी…

आसमान में बदल धीरे धीरे ही सही पर गरजते रहे , बारिश की बूँदें धीरे – धीरे ही सही पर धरती पर गिरती रही शायद वो भी अब इस प्यार के अलग होने का दुख जाहिर कर रहे थे , शायद दर्द आज इस कुदरत को भी हो रहा था , शायद आज कुदरत को भी अफ़सोस हो रहा था इस लड़ाई के खत्म होने का , एक बार फिर प्यार के अलग हो जाने का…..

सब को लगता है की कहानी में हमेशा प्यार की जीत होती है , मुझे भी लगता है अंत में हमेशा प्यार जीत-था है पर क्या ऐसे ‘ प्यार ‘ की जीत हुई या हार ?. में जनता हूँ सब सोचते हैं की मारना किसी प्यार के मिलन को नहीं दर्शाता वो सिर्फ़ जिंदगी भर का गुम चोद जाता है . ऐसा क्यों ? क्यों सब सिर्फ़ यही सोचते है की जिंदगी खत्म होते ही प्यार भी खत्म हो जाता है. ?

सवाल में खुद से पूछूँ या आपसे शायद जवाब वही रहेगा जो होना चाहिए , बस फर्क इतना है की शायद आप नहीं जानते की जवाब क्या है या फिर में भी नहीं क्यों की प्यार… प्यार का असली जवाब तो खुद प्यार के पास भी नहीं है . पर हाँ मेरे पास इतना जवाब तो है जो मैंने खुद महसूस किया है और शायद वो सही भी हो क्यों की क्या कभी वो प्यार किसी की जिंदगी चली जाने के बाद आपके दिल से निकल जाता है , अगर नहीं तो फिर प्यार मारा कब. वो तो कभी मारा ही नहीं . सच्चे दिल से किए हुए प्यार को तो कुदरत भी नहीं मर सकती तो फिर इंसान कैसे…

जिंदगी खत्म होती है जो इस कुदरत का नियम है पर प्यार ही एक ऐसी चीज़ है जो किसी कुदरत के नियम को नहीं मानती वो अपने नियम खुद बनती है , अपने वक्त को खुद बनती है और जो वक्त को खुद बना सकता है वो जिंदगी के खत्म होने के बाद भी ज़िंदा रहता है . मानो या ना मानो , मेरे शब्द शायद समझ नहीं आएँगे क्यों की कई बार शब्द भी कुछ समझने के लिए असमर्थ हो जाते हैं और तब काम आती है एक चीज़ ‘ एहसास…. ‘ जो प्यार का एक ऐसा टॉफ़ा है जो सबके अंदर है बस समझने की देर है…..

पर कहानी का क्या यही अंत है , जो मैंने अभी लिखा शायद हाँ यही है पर क्या इस बार कुछ अधूरा नहीं लग रहा आप सब को , नहीं लग रहा … मुझे लग रहा है … अभी ये कहानी अधूरी है कुछ बाकी है जो पूरा करना है.. कुछ है जिसे मुझे फिर अपने शब्दों में बताना है … शायद तब ये कहानी पूरी हो… पर क्या सच में ये कहानी अधूरी है??

” जिंदगी से जिंदगी जुड़ी है….. ”

कई बार मैंने सोचा की जो हुआ वो क्यों हुआ , क्या वजह थी , क्या हासिल हुआ उसमें , वही लड़ाई वही अंत , वही शैतान का हारना , वही प्यार की एक बार फिर जीत होना और अंत में कहानी में एक प्यार को बचाने के लिए किसी एक प्यार का खोना सब कुछ वही , इसलिए ऐसा लगता है मानो वो समय जो 100 साल पहले घ-त्ता था वो आज तक मौजूद है. अजीब बात है क्यों की अगर देखा जाए तो जो कहानी उस वक्त शुरू हुई उसका अंत वहीं हो जाना चाहिए था लेकिन उस ललच ने उसे खत्म नहीं होने दिया.

‘ हाँ मिल गया मुझे जवाब की ऐसा क्यों हुआ और क्या वजह थी , ‘ ललच ‘ थी वो वजह. ‘ जिसने इंसान को एक ऐसी लड़ाई लड़ने के लिए चोद दिया जिसे वो 100 सालों तक लड़ता आया , जिसमें उसने कुछ पाया और कुछ खोया.

अब में अगर कहूँ की उसने क्या पाया तो मेरे पास कुछ शब्द आते हैं , ‘ इंसानियत ‘ , ‘ प्यार ‘ , ‘ विश्वास ‘ और शायद सबसे बड़ी चीज़ ‘ अपनों का साथ ‘ लेकिन खोया भी बहुत कुछ और अगर में ये कहूँ की उसने क्या खोया तो मेरे पास शब्द आते हैं , ‘ इंसानियत ‘ , ‘ प्यार ‘ , ‘ विश्वास ‘ और शायद सबसे बड़ी चीज़ ‘ अपनों का साथ ‘ . समझ सकता हूँ अजीब लग रहा होगा की मैंने दोनों जगह एक ही बात क्यों कह दी. क्या मुझसे कोई गलती हो गयी लिखने में ? शायद नहीं , क्यों की अगर हम एक पल बैठ कर इस कहानी को सिर्फ़ एक पल बैठ कर सोचे तो क्या हमें ये समझ नहीं आएगा की जो हमने पाया वही हमने खोया , हर बार , बार – बार . हाँ जनता हूँ की हमने खोया था कुछ पाने के लिए , लेकिन पा कर भी हमने वही खोया जो हमने पाया . जनता हूँ मैंने फिर कन्फ्यूज़ कर दिया अपनी बातों से पर जब ये कहानी ही ऐसी है जहाँ अंत ही ऐसा होता है उसमें मेरे शब्द क्या करेंगे , वो तो वही कह रहे हैं जो मैंने महसूस किया है , मैंने देखा है , मैंने जाना है , यहाँ तक की मैंने जिया है.

लॅपटॉप से उंगली हटते हुए , को कॉफी का मग उठाया और मुंह से लगा लिया. सुबह की इस हल्की सी खिली धूप में हल्की सर्द हवा में गरम को कॉफी का अपना ही सुकून मिलता है. मैंने को कॉफी मग को टेबल पर रखा और फिर लॅपटॉप के उप्पर अपनी उंगली ले आया.

अजीब लग रहा है या फिर मुझे सुन कर खुशी हो रही है या फिर अभी तक समझ नहीं आया की में ज़िंदा हूँ. जनता हूँ समझना मुश्किल है और मना भी क्यों की इस कहानी का अंत ऐसा होता ही नहीं है , इस कहानी का अंत ही ऐसा है इसमें किसी की गलती नहीं. पर में ज़िंदा हूँ अगर नहीं होता तो ये कहानी शायद आप सब तक नहीं पहुँच पटा-थी . जनता हूँ अगला सवाल सबके मान में होगा की कैसे??

कैसे में ज़िंदा हूँ , में तो मर गया था ना तो फिर कैसे बच गया , पर क्या मैंने कहा था की में मर चुका हूँ , शायद नहीं एक बार भी नहीं . जनता हूँ सोच रहे होंगे की में अपने शब्दों में उलझा रहा हूँ , अगर ऐसा सोच रहे हैं तो फिर एक दम सही सोच रहे हैं. लेकिन फर्क इतना है की में नहीं शब्दों में तो इस कहानी ने उलझाया है……….

5 साल 6 महीने 21 दिन गुजर गये उस वक्त को पर आज भी वो वक्त मेरी आँखों के सामने है , वो रात मेरी आँखों में है . उस जगह से हज़ारों किलोमीटर दूर आने के बाद भी वो मेरी आँखों में ऐसे बसा है जैसे इसी जगह पर घटा हो. नहीं फ्लॅशबॅक में अब नहीं ले जाऊंगा क्यों की वहाँ जा-कर भी जवाब नहीं मिलेगा क्यों की उस सवाल का जवाब की में ज़िंदा कैसे हूँ मेरे पास खुद ही नहीं है . अधूरा पान लग रहा है की मेरे पास जवाब नहीं है तो फिर किस के पास होगा , हमें जान-ना है की कैसे बच गया में तो फिलहाल में शायद इसका सिर्फ़ एक जवाब दे सकता हूँ जिसे मैंने खुद महसूस किया और वो भी काफी टाइम से सोचने के बाद. आपको क्या लगता है की सिर्फ़ आप ही को अधूरा पान लग रहा है नहीं इस बात का अधूरा पान मुझे तब से लग रहा है जब मैंने अपनी आँख दुबारा खोली और उस पल से में सोचता आ रहा हूँ की ऐसा कैसे हुआ.. ?

इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने के लिए मैंने बहुत सोचा क्यों की इसे ज्यादा में कुछ नहीं कर सकता था , पर जब हर जगह सोचना बेकार हो गया तब मुझे इसका जवाब मेरे अपनों के बीच से ही मिला. जिनका इस कहानी में बहुत बड़ा योगदान रहा है , याद है आप सब को की कहानी में एक बार ध्रुव अंकल ने मुझे पिछली कहानी बताते हुए क्या कहा था की ,

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