अंध विश्वास ने दुनिया उजाड़ी

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1. अंध विश्वास ने दुनिया उजाड़ी – part -1

रात का अंधेरा गहराता जा रहा था. समय करीब 11:30 रहा होगा जब वो अपने घर से निकली थी. चारों तरफ सन्नाटा फैला हुआ था. बस हवायों और पेड़ के पत्तों की आवाज़ ही इस सन्नाटे को भंग कर रहे थे. कभी कभी कुत्तों के भौंकने की आवाज़ भी सुनाई पड़ जाती थी लेकिन वो चनिक मात्रा थी.

वो पैदल ही सबसे छूपते छिपाते शमशान की और जा रही थी. और कोई होता तो उसे इतनी रात को शमशान जाने के नाम से हार्ट अटॅक हो जाता, लेकिन जाने वो किस मिट्टी की बनी थी उसे बहुत प्रेतों का ज़रा भी भय नहीं था. वो तो बस अपने किसी उद्देसया के लिए जैसे सर पर कफ़न बाँध कर चली जा रही थी. हाथों में अपने पति की तस्वीर और कुछ पूजा का सामान लिए वो धीरे धीरे बिना डरे शमशान वाले रास्ते पर तरफ रही थी. डर था तो केवल इतना की कहीं उसे कोई देख ना ले और उसकी पूजा भंग ना हो जाए जिसके लिए उसे पूरे 10 दिन अमावस्या तक इंतजार करना पड़ा.

10 दिन पहले

रूपा एक बेहद खूबसूरत कोई 25 साल की नवयुवना थी जिसकी चाह हर किसी के मान में होती है. उसका पति रमेश खेतों में मज़दूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पालता था. दोनों का एक सुन्दर सा बेटा भी था जिसे दोनों ही बहुत प्यार करते थे. एक कारण ये भी था की इस बच्चे का जन्म ऑपरेशन से शहर में हुआ था जिसका खर्चा खते के मालिक ने दिया था और वो कर्ज धीरे धीरे रमेश चुका रहा था. इस ऑपरेशन के बाद अब रूपा कोई बच्चा नहीं जान सकती थी तो बस वही एक उनकी आँख का तारा था जिसे दोनों बेहद प्यार करते थे.

रमेश रोज़ सुबह नाश्ता करके काम पर चला जाता और शाम को घर आ जाता. दोपहर का खाना वो घर से लेकर जाता था क्योंकि खेत घर से दूर थे. खेत का मालिक भी बहुत अच्छा इंसान था जो समय समय पर रमेश की मदद कर देता था. उनकी जिंदगी बढ़िया चल रही थी लेकिन कब किस की नज़र लग जाए कोई नहीं कह सकता.

ऐसे ही एक दिन अचानक जब रमेश खेत में काम कर रहा था तो अचानक वो बेहोश हो कर गिर पड़ा. उसके साथ काम करने वाले दूसरे मजदूरों ने उसे उठाया और पास ही एक पेड़ के नीचे लिटा दिया. उसको ठंडे पानी के छींटे मर के उठाया गया और शायद ये उन लोगों के लिए नुक़सानदायक ही हुआ. रमेश होश में आते ही पागलों जैसी हरकत करने लगा. बिना मतलब चिल्लाना, हाथ पैर चलना, गलियाँ बकना उसने शुरू कर दिया.

पहले तो सब लोग कुछ समझ नहीं पाए लेकिन बाद में उन्हें लगा की कहीं इस पर कोई बहुत प्रêत का साया आ गया है जो ये इस तरह की हरकत कर रहा है. किसी तरह उन लोगों ने रमेश के हाथ पैर बाँध दिए और उसे उसके घर पहुँचा दिया. जल्दी ही ये खबर पूरे गाँव में आग की तरह फैल गयी. सब भौंचक्के से रमेश को देख रहे थे. रमेश उठता, चीकता चिल्लाता और फिर बेहोश हो जाता. रूपा की तो जैसे जान ही निकल गयी थी. उसे समझ नहीं आ रहा था की वो क्या करे. किसी ने भी ये ध्यान नहीं दिया की रमेश दो दिन से बुखार में था और आज बुखार इतना तेज हो गया था की उसके दिमाग में चढ़ गया था. सब इसे बहुत प्रêत का मामला समझ रहे थे और यही समझ रहे थे की बहुत प्रêत की वजह से ही रमेश का बदप ताप रहा है.

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