हॉंटेड – मुर्दे की वपसी – 130

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” प्यार करने का मौसम आ गया है , अपने मोहब्बत को पन्ने का सावन आ गया है…… ”

तभी मेट्रो की घंटी ने मुझे होश में किया और मुझे पता चला की मेरा स्टेशन आ गया है , में हंसता हुआ अपनी जगह से उठा और दरवाजा पे जा खड़ा हुआ , कुछ ही पल में मेरा स्टेशन आया , मेट्रो का दरवाजा खुला और में उतार गया…….

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आज कॉलेज का सब कुछ मुझे अलग ही लग रहा था , यूँ कहूँ तो कुछ नहीं दिख रहा था , कुछ दिखाई दे रहा था तो सिर्फ़ वो रास्ता जो मुझे उसे मंजिल की तरफ ले जा रहा था जहाँ पहुंचने के लिए में कब से इंतजार में था….

कॉलेज की उसे जगह पे जहाँ मेरी क्लास में मेरा वक्त खड़ा था में उसी पर चलता हुआ वहाँ पहुंच गया……………

क्लास में हलचल मची हुई थी , जड़तर बचे क्लास के बाहर मौसम का लुफ्त उठा रहे थे , वहीं आंशिका अपने फ्रेंड्स के साथ खड़ी हंसते हुए बातें कर रही थी….

” ई नो यार… थेन्क यू सो मच.. ” आंशिका हँसती हुई बातें कर रही थी तभी….

” दिल की जरूरत हो तुम.. आँखों का सुकून हो तुम…. ”

ये आवाज़ सुनते ही आंशिका ने हसना बंद किया और वो घूम गयी … घूमते ही उसका मुंह और उसकी आँखें खुली रही गयी….

” साँसों की गहराई में बसी हो तुम…”

मुंह से निकलते अल्फाज़ों को सुनकर वो समझ ही नहीं पा रही थी की अचानक से उसके साथ ये क्या हो रहा है वो महसूस नहीं कर पा रही थी की क्या एक्सप्रेशन दे , खुश होना चाहती थी लेकिन इस वक्त वो हैरान थी वो समझ नहीं पा रही थी की क्या करे इसलिए बॅस वो खड़ी हुई उन अल्फाज़ों को सुनती गयी…..

” बॅस कभी इन साँसों को थमने मत देना क्यों की … इन साँसों में बस्सी धड़कन हो तुम… ”

” दिल की जरूरत हो तुम.. आँखों का सुकून हो तुम.. साँसों की गहराई में बसी हो तुम… बॅस कभी इन साँसों को थमने मत देना क्यों की इन साँसों में बस्सी धड़कन हो तुम… ”

इतनी आवाज़ के बाद कुछ पल पूरी क्लास में शांति हो गयी , सब आंशिका की तरफ देख रहे थे और वो सामने हो रहे पल को देख के कुछ रिएक्ट करने की कोशिश कर रही थी लेकिन वो कुछ समझ ही नहीं पा रही थी…..

” आंशिका में नहीं जनता की में कब से तुमसे प्यार करने लगा , बॅस जनता हूँ तो इतना ही की मेरे लिए दिल में बस्सी धड़कन हो तुम , हर एहसास का महसूस हो तुम , अब मुझे जिंदगी में कुछ चाहिए तो वो खुशी हो तुम…. ” जैसे जैसे आंशिका ये सब सुन रही थी वैसे वैसे उसके दिल की धड़कने उछाल रही थी जिससे उसके अंदर की फ़ीलिंग्स भी ड़ थी जा रही थी…

एक लड़की के अंदर चल रहे इस एहसास को समझना बेहद मुश्किल होता है जब कोई उससे इतना प्यार देने के लिए कह रहा हो , वो तो वही से अपने प्यार के पलों को सज़ने लग जाती थी है , वही हाल आंशिका का भी था , वो इतनी खूबसूरत बातों को सुन खो चुकी थी ….

” ई लव यू आंशिका , ई लव यू , विल यू भी में गर्लफ्रेंड , ई स्वेर में तुम्हें अपने वक्त के साथ जोड़ के रखूँगा , तुम्हारी इन पलकों में छुपे हर प्यार को कभी बहने नहीं दूँगा , कभी नहीं…… ”

” आंशिका विल यू भी में लव ऑफ में लाइफ प्लीज़….. ”

आंशिका के कानों में जैसे ही ये पल सुनाई दिए तो वो साँसें लेना ही भूल गयी , उसके कानों में ‘ ई लव यू ‘ की आवाज़ सुनाई देनी लगी साथ साथ उसके धड़कते दिल की , वो उसे धड़कते हुए दिल को महसूस करने की कोशिश करने लगी , उसके लिए ये वक्त इतना धीरे चलने लगा मानो वो इस वक्त से बाहर नहीं निकलना चाहती हो , बॅस इस वक्त में रही के इसी तरह इस एहसास में खोना चाहती हो , लेकिन सामने वो आँखें उसके दिल की बातें जाने का इंतजार कर रही थी इसलिए वक्त की इस खूबसूरती से बाहर आकर आंशिका ने खुशी में झूमते हुए अपनी खुशी भारी आवाज़ में कहा जिसमें उसकी फ़ीलिंग उसकी आवाज़ के साथ घुल चुकी थी….

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तूने मेरे जाना कभी नहीं जाना इश्क मेरा, दर्द मेरा, हें!

तूने मेरे जाना कभी नहीं जाना इश्क मेरा, दर्द मेरा ” इसे….. इसे ई विल ” कहते हुए आंशिका ने अपना हाथ आगे बड़ा दिया…….

जैसे ही आंशिका के लफ़्ज़ों से निकले शब्दों को सुना मेरी आँखों ने मुझसे बिना पूछे अपने दर्द को बहा दिया , शरीर बिखरने सा लगा और खुद बीए खुद पीछे हटने लगा , वक्त के साथ साथ सबने अपना साथ चोद दिया और बैग कंधे से फिसलता हुआ नीचे गिर गया….

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आंशिका के बड़ा ये हाथ को देख हर्ष ने उसका हाथ पकड़ा और अपनी जगह से खड़ा हुआ और खुशी में चिल्लाता हुआ आंशिका के गॅल लग गया , आंशिका भी खुश होती हुई उसकी बाहों में खोती चली गयी … आशिक तेरा भीड़ में खोया रहता है, जाने जहाँ पूछो तो इतना कहता है

डेठ ई फील सो लोन्ली ये… तेरे’से आ बेटर प्लेस तन तीस एंप्टीने

और ई’में सो लोन्ली ये तेरे’से आ बेटर प्लेस तन तीस एंप्टीने, ये! आंशिका की हाँ सुन्न सार बचे शोर मचाने लगे , जीतने बचे बाहर खड़े थे वो चिल्लाते हुए श्रेयस को धक्का देते हुए अंदर जाने लगे , सब हर्ष और आंशिका की इस खुशी में उनका साथ देने लगे वही..

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में सबको अंदर जाता देख रहा था , सब खुश थे पर में नहीं था , में इसलिए नहीं था क्यों की में रो रहा था लेकिन अभी महसूस नहीं कर पा रहा था , पर अब में और खड़ा नहीं रही पा रहा था इसलिए मैंने अपना बैग उठाया और चेहरे पे आए आँसू को पोछा और वहाँ से जाने लगा , आँखों के आगे कुछ था तो उसके आँसू जिसने सब कुछ ढूंडला बना दिया था , चलता हुआ में वहीं जा पहुंचा जहाँ में हमेशा से अपने दर्द को अच्छे से महसूस कर पता था…..

दरवाजा खोल के में सीधे जाकर दीवार का सहारा लेकर खड़ा हो गया और इस खुले मौसम में गहरी गहरी साँसें लेने लगा मानो अंदर से किसी चीज़ को बाहर आने से रोक रहा हूँ , पर कोई फायदा नहीं हुआ मैंने अपना बैग खोला और उसमें से आंशिका के लिए बनाया हुआ वो कार्ड निकाला जिसमें मैंने आंशिका के अलग अलग रूप उस पर लगाए हुए थे जिन्हें देखते ही…..

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तप तप करते आँसू उसे कार्ड पे गिरने लगे और में घुटनों के बाल बैठ के ज़ोर ज़ोर से रोने लगा , ना जाने क्यों पर रोने लगा , ” नहीं नहीं , नहीं रोना मुझे नहीं रोना.. ” फूली हुई साँसों से मैंने अपने आप को संभाला और अपने आँसू पुन्छे लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ क्यों की वो पोछने के बाद भी नहीं रुके , वो तो बॅस बहते जा रहे थे , बहते जा रहे थे …..

मेरी नज़र जब उसकी फोटो पे पड़ा तो आँखों से निकलते आँसू के साथ साथ दिल फिर से चेखते हुए अपने दर्द को बहाने लगा और में फिर से रोने लगा , ” आअनह आअनह….. ” आँखों से दिल के टुकड़े बह रहे थे और में उन्हें बहते हुए सिर्फ़ महसूस कर पा रहा था जिससे मेरा हर अंग चूबते हुए दर्द दे रहा था..

‘ प्यार ना मिलने की तकलीफ से ज्यादा दर्द तब होता है , जब वही प्यार किसी और के पास चला जाता है…… ‘

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पता नहीं पर ना जाने कितनी ही देर तक में इस खुले मौसम में ऐसे ही बैठा रहा , आँखों से आँसू बह रहे थे लेकिन मेरा दिल अब तक चुका था चेखते चेखते क्यों की वो जान चुका था की इस दर्द की तकलीफ को सुनाने वाला कोई नहीं है , सिर्फ़ ये साँसें है जो उसे तकलीफ के साथ चलती रहेंगी ….

क्या सोच के आया था में इस मौसम में की आज हर खुशी को अपने नाम कर लूँगा , पर इस वक्त ने मुझसे वो आने वाली खुशी के पल छीन लिए , मेरे दिल की हर धड़कन को तोड़ दिया .. कुछ देर में आसमान की तरफ देखने लगा लेकिन बार बार आंशिका की परछाई मेरे सामने आ जाती और आँखों में ना जाने कहाँ छुपे आँसू को बाहर ला देती…..

पर कब तक यूँ की बैठा रहता , जिंदगी तो बिखर ही चुकी थी , पर इस बिखरी हुई जिंदगी को छुपाना भी था , इसलिए बड़ी मुश्किलों से मैंने अपने शरीर को इस कदर रोका की वो कम से कम आँखों से आँसुओं को हटा ली , क्यों की इस बिखरे हुए पल को में किसी के साथ नहीं बटना चाहता था …

मैंने अपने आप को संभाला चेहरे को साफ किया बैग उठाया और उसे कार्ड को भी , कुछ पल उससे देखने लगा पर उससे देखते हुए फिर से जी भारी होंने लगा इसलिए मैंने उससे बैग में डाल दिया और कुछ पल इधर – उधर देखने के बाद में वहाँ से चल दिया , हमेशा हमेशा के लिए फिर से कभी वापिस ना आने के लिए…क्यों की इससे बड़ा दर्द अब में कभी नहीं बाँट पाऊँगा…

हॉंटेड – मुर्दे की वापसी - एक हॉरर स्टोरी

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