वो शाम भी अजीब थी, ये शाम भी अजीब है – भावनाओं का युद्ध – Emotional Saga – Part2 -136

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वो टैक्सी में सूमी के घर की तरफ आ रहे थे. जैसे जैसे उनकी टैक्सी नज़दीक आती जा रही थी, सोनल के पेट में दर्द बड़ना शुरू हो गया था. सुनेल कोई 100 कदम के फासले पे जब रही गया तो सोनल का दर्द तीवरा और अहसाहनिए हो चुका था साफ निशानी थी लेबर पेन की . अब सुनील समान घर ले के पहुँच चुका था और गाड़ी निकाल्क रहा था सोनल को हॉस्पिटल ले जाने के लिए जो बस 5 मिनट की दूरी पे था.

सुनेल की टैक्सी ट्रैफिक में फँस गयी और जब तक ट्रफ़िक खाली हुआ सुनील सोनल को हॉस्पिटल ले जा चुका था और सोनल को ऑपरेशन थियेटर ले जा गया.

यहाँ जैसे ही सुनेल के कदम घर की लॉबी पे पड़े वहाँ सोनल ने दो प्यारे बच्चों को जन्म दिया. एक लड़का और एक लड़की – लड़का सोनल और सुनील का था क्योंकि उसमें सोनल की छवि ज्यादा थी और लड़की सुनील और सुमन की थी क्योंकि उसमें सुनील की छवि के साथ सुमन की भी छवि थी. दोनों बच्चों को इंक्यूबेट्र में रखना पड़ा क्योंकि समय से पहले पैदा हो गये थे. सोनल की हालत ठीक थी. बच्चों के जन्म से सुनील बहुत खुश हुआ था बस दुआ माँग रहा था की सही सलामत रहें.
यहाँ सुनील ने सूमी को फोन कर खुशख़बरी दी उसी वक्त कामिनी ने घर की बेल बजा दी.

सूमी ने दरवाजा खोला और सामने कामिनी थी, सूमी की नजरें शायद सुनेल को ढूंढ. रही थी, क्योंकि उसे नहीं पता था के कामिनी सुनेल की पत्नी है. कामिनी को यूँ अचानक देख सूमी हैरान हुई और हॉल में बैठी रूबी सकते में आ गयी. अभी वो उसके और सभी के साथ हुए घटनाकरम को नहीं समझ पाई थी, कामिनी का यहाँ आना उसे एक भुंचाल का संकेत देने लगा.

सूमी को शायद इस वक्त कामिनी का आना पसंद नहीं आया था वो इस वक्त भाग के अपने बच्चे को अपनी गोद में लेना चाहती थी, पर जैसे ही कामिनी उसके पैर छूने को झुकी तो पिच खड़ा सुनेल उसे नज़र आ गया.

एक बेटा जो बरसों से बिछड़ा हुआ था वो सामने था और एक बेटी जिसने अभी जन्म लिया था वो इंतजार कर रही थी आंटी की गोद में सामने को, सूमी के उरज़ोन से दूध रिसने लगा था और पल भर तो वो पत्थर बनी खड़ी सुनेल को देखती रही ये भी भूल गयी की कामिनी झुकी उसके आशीर्वाद का इंतजार कर रही थी.

भावनाओं के समंदर में फँसी सूमी अपने अश्रु रोक ना पाई लड़खड़ाने को हुई तो उसके हाथ अपने आप कामिनी के सर पे चले गये जैसे आशीर्वाद ही दे रहे हूँ.

‘मां!’ एक दर्द था सुनेल की पुकार में जिसे सिर्फ़ वही आंटी पहचान सकती थी जिसने उस आवाज़ को जन्म दिया हो.

सूमी के कान तरसने लगे फिर से उस आवाज़ को सुनाने को

‘मां!’

सुनेल मेरा बच्चा – सूमी जैसे चीख ही पड़ी और सुनेल को बाँहों में ले उसके चेहरे को बोसो से दागने लगी – ‘मां! – ओह आंटी ’

दोनों आंटी बेटे एक दूसरे की बाँहों में समय अपने आँसुओं से उन सालों की दूरी को मिटा रहे थे.

सुनील फिर फोन करता है तो मोबाइल की बेल दोनों आंटी बेटे को होश में लाती है.

सूमी अपना मोबाइल उठा कॉल रिसीव करती है.

‘हाँ जी बस आ रही हूँ….ओह कितना दिल तरस रहा है अपनी बेटी को सीने से लगाने को, कैसे हैं मेरे दोनों बच्चे, उनको कहना आंटी आ रही है बस थोड़ी देर में’

नयी नयी बनी आंटी ये भूल गयी थी के सामने खड़े सुनेल पे वज्रपाट हो गया था.

उसकी आंटी फिर से कैसे आंटी बन सकती है ….क्या हो रहा है यहाँ…….ओह गोद कहीं जो ख़यालात उस दिन मान में आए थे कहीं वो सच तो नहीं…..ना ही…नहीं…नहीं…ये ये नहीं हो सकता.

सूमी – सुनेल चल तुझे तेरे भाई बहन से मिलती हूँ’

सुनेल तो कहीं खो चुका था.

सुनेल दीवार से सात गया था. कामिनी की नजरें उसपर ही गाड़ी हुई थी, सुनेल को जैसे सूमी की आवाज़ सुनाई ही ना दे रही थी – यूँ लग रहा था जैसे बरसों बाद आंटी मिली और पल भर में छीन भी गयी. बड़ी मुश्किल से उसने अपने आँसू रोके और खुद को समझने लगा की जो सोच रहा है गलत सोच रहा है.

मां नानी या दादी भाई होगी और वो भी तो आंटी ही होती है.

कामिनी ने उसे हिलायया.

सूमी : अरे मैं भी कितनी बेवकूफ़ हूँ. तुम लोग तक गये होगे. कामिनी तू इसे सुनील के कमरे में ले जा मैं कुछ देर मैं आती हूँ. तब तक तुम लोग आराम कर लो.

सुनेल जो सच तक जल्दी पहुँचना चाहता था, बोला ‘मां मैं भी साथ चलूँगा’

कामिनी ने इशारे से उसे रुकने को कहा पर सुनेल गुस्से से उसे देखने लगा तो कामिनी बस सर झुका के रही गयी.

सूमी : अच्छा चलो, सुनील और सोनल तुम लोगों से मिल बहुत खुश होंगे, कामिनी को तो जानते ही हैं पर असली खुशी तो सुनेल से मिल के होगी.

तीनों हॉस्पिटल की तरफ निकल गये घर में रूबी रही गयी, रास्ते में भी सूमी को इस बात का ख्याल ना आया की सुनेल के सामने उनकी कड़वी सच्चाई यकायक खुल जाएगी, वो तो बस अपने बच्चों को अपने गोद में लेने को आतुर थी, उन्हें अपना दूध पिलाने को तड़प रही थी.

सुनेल रास्ते भर दुआएँ माँगता रहा जो महसूस वो कर रहा है वो सच ना निकले.

जैसे ही ये लोग हॉस्पिटल पहुँचे सूमी के कदम तेज हो गये जैसे उसे मालूम था कहाँ जाना है – सुनेल और कामिनी उसके पीछे थोड़ी दूरी बना चल रहे थे. सूमी ने एक दरवाजे पे नॉक किया सुनील ने खोला और उसे अपनी बाँहों में समेट लिया जैसे कोई अपनी बीवी को समेटता है – बस पीछे आते सुनेल के कदम वहीं जम हो गये, आँखों के आगे अंधेरा छा गया – ये नज़ारा उसे दिल के टुकड़े टुकड़े कर गया .

कामिनी ने उसे हिलाया सुनेल की ये हालत देख वो भी दुखी हो रही थी.

कामिनी : सुनो जिस काम के लिए आए हो उसपर ध्यान दो, बाकी सब पे नहीं.

सुनेल ने भीघी आँखों से उसे देखा – बरसों बाद आंटी मिली पर लगता है खो चुका हूँ मैं अपनी आंटी ….

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