वो शाम भी अजीब थी, ये शाम भी अजीब है – भावनाओं का युद्ध – Emotional Saga – Part2 -137

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कामिनी : देखो, इंसान की बहुत मजबूरियाँ होती हैं. तुम्हें क्या पता पीछे क्या हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ, कोई गलत धारणा मान में मत पालो. आंटी आंटी ही होती है.

तभी सुनील की नज़र सुनेल पे पड़ती है वो सूमी को चोद देता है…सूमी भी जैसे यथार्थ में वापस आती है.

सूमी : देखो कोन आया है और सुनेल और कामिनी की तरफ इशारा करती है.

सुनील के कदम सुनेल की तरफ खुद बीए खुद बाद जाते हैं और सुनेल भी खुद को रोक नहीं पता. एक भाई की कशिश एक भाई को पुकार रही थी.

दोनों भाई एक दूसरे के गले लग गये और दोनों एक दूसरे को अपने आँसुओं से भिगोने लगे. आह दिल दिल को पहचानने लग गया और सुनील को सुनेल के दर्द का अहसास हो गया.

सुनील चुप ना रही पाया और बोल ही पड़ा ‘तेरा दर्द समझता हूँ मैं भी इसी दर्द से गुजरा था पर होनी ने हो कर रहना था, अंकल के हुकुम को नहीं टाल सका.’

सुनेल उससे अलग हो गया और गुस्से से उसे देखने लगा.

सुनील : भाई आराम से घर पे बात करेंगे चल सोनल से मिल.

सोनल से मिलने की ललक सुनेल को फट पड़ने से रोक लेती है. और वो सुनील के साथ कमरे में चला जाता है.

सोनल के सामने जब दोनों आते हैं तो वो तो पलकें झपकना भूल जाती है और फटी आँखों से दोनों को देखने लगती है.

अगर सुनेल की फ़्रेच कट हटा दो तो दोनों में कोन सुनील और कोन सुनेल कोई नहीं पहचान पाएगा.

सूमी : देख सोनल तेरा बिछड़ा भाई आ गया. किस्मत ने खून से खून को मिला ही दिया.

तभी नर्स अंदर आती है. सोनल को लेने बच्चों को दूध पिलाने का वक्त हो गया था. सूमी साथ जाती है.

और सुनेल दोनों को जाते देखता रहता है.

सुनेल से रहा नहीं जाता और पूंछ ही लेता है —- ये ये क्या….

सुनील : वक्त की मर कह या हालत, कुछ भी कह सोनल मुझ से प्यार करने लगी थी. मैं दूर भागता था पर वो नहीं मानती थी….एक दिन सूमी के कहने पे मुझे सोनल से शादी करनी पड़ी. रिश्ते स्वाहा हो गये और नये रिश्ते जन्म ले बैठे.

सुनेल : वाह क्या सीन है पहले आंटी से शादी फिर बहन से शादी इतने पे भी बस नहीं क्या और अब मासी से भी शादी. बारे अच्छे गुल खिलाए तूने. लानत है तुझे तो इंसान बोलने में भी शर्म आती है, पता नहीं किस मनहूस घड़ी में तू मेरा भाई बना.दिल तो करता है गड़ दम तुझे ज़मीन में.

कामिनी घबरा गयी उसका सपना उसकी आँखों के सामने आ गया.

कामिनी : चुप करिए आप, जब कुछ पता ना हो तो मर्यादा के रक्षक मत बानिए. मैं जानती हूँ सुनील भाई कैसे हैं. जब मैं इन्हें आप समझती थी, इन्होंने मेरा कोई फायदा नहीं उठाया मुझ से दूर ही रहते थे.

सुनेल : गुस्से से कामिनी को…यानि तुम सब जानती थी बहुत पहले से और मुझे भनक भी नहीं लगने दी.

कामिनी : इसमें मेरा दोष नहीं आपने ही मना किया था आप कुछ नहीं जानना चाहते थे क्या हुआ मेरा साथ क्यों हुआ.ये सब भी तो उसका हिस्सा ही था क्योंकि मेरा रिश्ता इनसे तब बना जब रमेश से मेरी शादी हुई थी.

कामिनी भी कुछ ज़ोर से ही बोल बैठी.

सुनील : चुप करो दोनों यहाँ तमाशा करने की जरूरत नहीं घर छलके बात करेंगे.

सुनील गुस्से में पैर पटक कमरे से बाहर निकल गया.
सुनील के बाहर जाते ही

कामिनी : देखो इतना भड़कने की जरूरत नहीं भाई ने कहा ना घर पे बात करेंगे, उनकी पूरी बात सुनना फिर किसी नतीजे पे पहुँचना. और आप तो उनकी जान बचाने आए थे ना. तो पहले वो काम करो जो सबसे जरूरी है.

कामिनी की बात सुन सुनेल को अपना वो फैसला याद आता है जिसके लिए वो यहाँ आया था, बात सिर्फ़ सुनील की होती तो शायद वो यहीं से वापस चला जाता पर आंटी को मो और सभी मासी जिसने उसके लिए बहुत कुछ किया था इन दो बातों ने उसे रोक दिया.

सुनेल : चलो घर चलें सभी मासी पता नहीं किस हालत में होगी.

दोनों किसी को बिना कुछ कहे घर की तरफ निकल पड़े. गलियारे में एक तरफ खड़े सुनील ने उन्हें जाते हुए देख लिया पर रोका नहीं. इस वक्त वो भी गुस्से में था और यहाँ बात नहीं बदाना चाहता था.

कुछ देर बाद सूमी और सोनल दोनों आ जाती हैं, सुनील पे नज़र पड़ते ही सूमी को समझते देर ना लगी की दोनों भाइयों में कहा सुनी हो गयी है. सोनल भी उसके दिल का हाल समझ जाती है.

सोनल में अभी कमज़ोरी थी इसलिए उसे वील चेयर पे लाया ले जा जा रहा था, उसे अभी भरपूर आराम और खुराक की जरूरत थी, सोनल ने सूमी की तरफ देखा और सूमी ने सुनील को आवाज़ लगा दी.

सूमी की आवाज़ सुन सुनील ख्यालों की दुनिया से वापस आया और चेहरे पे मुस्कान लेट हुए दोनों की तरफ बाद गया जो कमरे में चली गयी थी, सोनल को बिस्तर पे लिटा दिया गया था.

कमरे में घुसते ही सुनील ने दरवाजा अंदर से बंद कर दिया और सोनल के पास जा के बैठ गया, उसके चेहरे को हाथों में ले उसके लबों पे चुंबन करते हुए बोला ‘लव यू डार्लिंग तुमने मुझे जीवन की सबसे बड़ी खुशी दे दी.’

सूमी : और मुझे भी आज मेरी बेटी और बेटा फिर से मेरे पास आ गये, आंटी बनने का ये सुख, अब तुम समझ गयी होगी.

सोनल : हाँ दीदी, आज पता चला, आंटी क्या होती है, ओह ई आम सो हॅपी.

तीनों एक दूसरे से लिपट गये जैसे कभी जुड़ा ना होंगे और तीनों के जिस्म एक दूसरे में घुल जाएँगे. पति और पत्नियों का ये मिलन भी अनोखा था क्योंकि अब उनके बीच कभी ना टूटने वाला पुल बन गया था एक नया रिश्ता जन्म ले चुका था, एक नया अहसास जन्म ले चुका था मातृतव और पितरतव का. एक प्यार भारी जिम्मेदारी नये जीवन को रही दिखाने की.

कुछ देर बाद सुनील दोनों से अलग हुआ अब वो कुछ सीरीयस सा हो गया था.

सुनील : सोनल तुम्हारे लिए सुनेल भाई ही रहेगा, कभी उसे देवर मत बुलाना.

सोनल ने चौंक के उसकी तरफ देखा.

सुनील : और सूमी तुम्हारे….

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