वो शाम भी अजीब थी, ये शाम भी अजीब है – भावनाओं का युद्ध – Emotional Saga – Part2 -139

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जो केवल एक प्रेमिका के दिल में ही उठ सकती है. सूमी को सारा समान देने के बाद वो सुनील के पास गयी.

‘आप इतने परेशान अच्छे नहीं लगते, सब ठीक हो जाएगा.’

उसकी बात से सुनील यथार्थ में वापस आया.

रूबी का सुनील से बात करने का तरीका बदल चुका था अब वो एक बीवी की तरह ही बात करती थी और उसी तरह उसके दिल में सुनील के लिए चिंता रहती थी. सुनेल और सुनील के बीच अब क्या होगा ये सोच सोच कर वो भी परेशान थी, पर अपनी तरफ से सुनील को हिम्मत दे रही थी, क्योंकि जानती थी के सुनील गलत नहीं गलत हालत हुए थे और वो उन हालातों में पिसता चला गया था.

क्या एक बिछड़ा बरसों बाद मिला भाई अपने भाई के दिल की हालत समझेगा या फिर मर्यादा को रोना रोएगा. मना रूबी और सुनील की अभी शादी नहीं हुई थी लेकिन वो दिल से सुनील की थी और अब तो उसके दिल पे सुनील की ना मितनेवाली मोहर लग चुकी थी.

कस सभी के साथ ये सब ना होता तो उसकी अपनी सुहागरात भी जल्द होती. कितने सपने सजा रखे थे उसने और कितनी बेसब रही से उस रात का इंतजार कर रही थी जब दो बदन एक दूसरे में खो कर दो रूहों का मिलन करवा देते हैं. और अब तो ये एक ना टूतनेवाला प्यार का अमित सागर बन जाएगा जहाँ सूमी,सोनल,सभी और रूबी अपने प्यार की बरसात से सुनील को सराबोर करती रहेंगी. रूबी को उस पल का इंतजार था.

सुनील : तुम घर जाओ, सुनेल और कामिनी को तुम्हारी जरूरत पड़ सकती है. यहाँ सूमी है ना मैं भी कुछ देर में आ जाऊंगा.

तभी सूमी के फोन पे प्रोफ. का फोन आता है की वो एक घंटे में पहुँच जाएगा.

सूमी – सुनील और रूबी को वापस घर भेज देती है ताकि प्रोफ को सुनील रिसीव कर सके और सारी बात डीटेल में बता सके. सुनील रूबी के साथ घर चले जाता है.
इधर सुनील घर पहुँचा वहीं उसी वक्त प्रोफ. सिद्धेश्वर भी पहुँच गया. उसे सुनील कुछ बदला सा लगा लेकिन घर के अंदर जा जब उसने सुनेल को देखा तो अचांबित रही गया. उसे समझने में डर ना लगी कुदरत ने क्या खेल खेला.

प्रोफ. को सुनील ने एक कमरा दे दिया जहाँ वो आराम कर अपनी तंकन उतार सके.

दोनों भाइयों के बीच जो बारूद फटना था वो कुछ समय के लिए टाल गया था, क्योंकि सुनेल भी नहीं चाहता था के धिंडोरा पीते.

सुनील काफी टेन्स था वो अपने कमरे में चला गया. रूबी ने उसके लिए कॉफी बनाई और उसके पास चली गयी. सुनेल और कामिनी हॉल में ही बैठे थे. कामिनी बार बार सुनील को इशारों से शांत रहने को बोल रही थी.

रूबी जब सुनील के पास पहुँची तो वो कुर्सी पे तक लगाए आँखें बंद किए कुछ सोच रहा था.

रूबी ने कॉफी वहीं साइड टेबल पे रखी, और सुनील के सर पे प्यार से हाथ फेरती हुई बोली ‘ आप इतना परेशान क्यों हो रहे हो, सब ठीक हो जाएगा, सुनेल भाई कोई बुरे नहीं हैं समझ जाएँगे और नियति के इस खेल को स्वीकार कर लेंगे’

सुनील ने अपनी आँखें खोली उसमें दर्द का सागर लहरा रहा था.

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रूबी ने अपने लरजते होंठ उसकी आँखों पे रख दिए और चूम लिया ‘ बस और मत तदपइए खुद को – कॉफी पियो तब तक में बाथरूम रेडी कर देती हूँ, फ्रेश हो जाना’

सुनील इस वक्त खुद को बहुत अकेला महसूस कर रहा था, उसे सोनल और सूमी की बहुत याद आ रही थी दिल कर रहा था के उनके पास चला जाए पर घर में प्रोफ. आ चुका था और वो उनकों यूँ अकेला नहीं छोड सकता था, सभी की भी उसे चिंता थी, जाने क्या होगा.

रूबी ने बाथरूम रेडी कर दिया और सुनील फ्रेश होने बाथरूम चला गया, कॉफी उसकी आधी ही रही गयी थी, रूबी ने वो कप उठा लिया और जहाँ सुनील के होठों के निशान थे वहीं अपने होंठ रख कॉफी सीप करने लगी, उसे यूँ महसूस हो रहा था जैसे असल में ही उसके होंठ सुनील के होठों से चिपक गये हूँ, जिस्म में चिंगारियाँ फूटने लगी और आँखें बंद कर वो खुद को सुनील की बाँहों में लरज़ता हुआ महसूस करने लगी.

प्रोफ. कमरे में जा कर आराम नहीं कर रहा था, पर कुछ समान निकल अपने सामने रख वो ध्यान में लग गया था. करीब एक घंटे बाद उसका ध्यान टूटा और उसके जिस्म में कुछ परिवर्तन आ चुका था, यूँ लग रहा था जैसे कोई रोशनी उसके जिस्म से निकल रही हो, माथे पे तेज चमाजक्ने लगा था.

प्रोफ. को जब भी कुछ इस तरह का काम करना होता था वो एक अच्छी आत्मा को अपने जिस्म के अंदर आह्वान कर लेता था. इस आत्मा ने अपने मानवीया जीवन में त्याग ही त्याग किया था और जिनके लिए सब कुछ किया वही उसकी मॉट का कारण बने, लेकिंग आत्मा के रूप में आने के बाद उसके अंदर कोई द्वेष की भावना नहीं थी. एक दिन प्रोफ. एक शमशन में साधना कर रहा था वहीं प्रोफ और उस आत्मा की जान पहचान हुई, अभी उस आत्मा की मुक्ति का समय नहीं आया था और वो प्रोफ. को उस्केव अच्छे कार्यों में मदद करने को तैयार हो गयी थी. प्रंतु प्रोफ. ने कभी आती नहीं करी, जब बहुत ही जटिल कार्य होता था तभी वो उसका आत्मा को बुलाता था, और सभी के जिस्म में रहने वाली आत्मा भी धीरे धीरे ताकतवर बन चुकी थी.

प्रोफ. कमरे से बाहर निकला और सब को हिदायत देने के बाद वो सभी के कमरे में चला गया. उसके कमरे के अंदर घुसते ही सभी उछाल के बिस्तर पे खड़ी हो गयी और लाल आँखों से प्रोफ. को घूरने लगी.

‘कोन हो तुम क्यों आए यहाँ’ ये आवाज़ प्रोफ के मुँह से निकली पर आवाज़ बदली हुई थी.

‘तुझे इस से मतलब ये मेरी महबोबा है मैं इसे पा कर रहूँगा’

‘तुम अपना जीवन त्याग चुके हो क्यों इसे दुखी कर रहे हो, अगर प्यार करते हो इससे तो इसे छोड दो जीने दो इसे अपना जीवन. प्यार तो बलिदान का नाम होता है क्या तुम्हारा प्यार इतना कमजोर है.’

‘बहुत तड़पा हूँ इसके लिए मैं अब….

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