वो शाम भी अजीब थी, ये शाम भी अजीब है – भावनाओं का युद्ध – Emotional Saga – Part2 -143

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सुनील के लिए की वो उसके और करीब आए जिसे सुनील समझ ना पाया और आइक्यू की खिड़की के बाहर खड़ा भरे मान से दोनों को देखता रहा.

सुनील ने विजय को फोन किया और बताया की वो हॉस्पिटल पहुँच चुका है. विजय ने उसे वहीं रुकने को बोला और कुछ देर में नाने का कहा.

सुनील सुनेल को ही देख रहा था अचानक सुनेल की आँख खुली – दोनों भाइयों की आँखें चार हुई – सुनील फट से आइक्यू के अंदर भगा और जैसे ही उसने सुनेल का हाथ अपने हाथ में लिया उसके जिस्म में एक भूचाल शुरू हो गया …..सुनील की क्या रूप बदलने लगी चेहरे पे एक तेज आ गया और सुनेल का जिस्म एक दम शीतल पड़ गया जैसे किसी योगी ने योग समधी ले ली हो.

सुनील फट से सुनेल से अलग हुआ पर अब तक जो होना था वो हो चुका था. सुनेल की आत्मा सुनील के अंदर समा चुकी थी – दोनों में युध सा चल रहा था और सुनील के चेहरे का रंग पल पल बदल रहा था आइक्यू में माजूद सारा स्टाफ हैरान था की हो क्या रहा है सुनील की हालत देख कोई उसके नज़दीक जाने का साहस ना कर रहा था पर अंत में सुनेल विजयी हुआ और उसने सुनील के जिस्म से उसकी आत्मा को बाहर निकल फेंका जिसके पास और कोई चारा नहीं था के वो सुनेल के जिस्म में आश्रण ले.

जैसे ही सुनील की मातमा ने सुनील के जिस्म को छोडा दो लोगों के दिल को बहुत पीड़ा हुई – सूमी और सोनल, दोनों के जिस्म पसीने पसीने हो गये दिल की धड़कन बाद गयी सुनील के साथ किसी अनिष्ट की सूचना उनकी आत्मा को मिल चुकी थी और दोनों एक दूसरे को देख जैसे कोई फैसला लेने चाहती थी.

सूमी : नहीं सुनेल ये नहीं कर सकता, क्या मकसद है उसका वो इस तरह आत्माओं की अदला बदली नहीं कर सकता.

रूबी : ये ये क्या कह रही हो आप.

सोनल : हाँ रूबी सुनील की आत्मा का संदेशा हम तक पहुँच गया है, पता नहीं इस सबके पीछे सुनेल का मकसद क्या है – लेकिन मैं ऐसा नहीं होने दूँगी अगर सुनेल ये सोचता है की आत्माओं की अदला बदली कर वो हमें पा सकता है तो ये उसकी बहुत बड़ी भूल है वो सब कुछ खो देगा और नितांत अकेला रही जाएगा जैसे पहले था. सुनेल मेरे लिए एक भाई है और कोई दूसरा रूप नहीं ले सकता है, उसकी आत्मा कितने भी छोले बदल ले वो मेरे निकट नहीं आ सकता जल के भस्म हो जाएगा.

इस वक्त सोनल एक घायल नागिन की तरह फुफ्कार रही थी.

रूबी : अरे दीदी आप चड़े घोड़े पे क्यों सवार रहती हो, सभी दीदी के साथ जो हुआ वो जानते हुए भी, और इस काम को सिर्फ़ सुनेल कर सकता है, उसका जिस्म घायल है तो उसने सुनील के मजबूत जिस्म में शरण लेली ताकि वो सभी को बच्चा सके आप हर वक्त गलत क्यों सोचते हो. मैंने सुनेल की आँखों में रिश्तों के लिए जो तड़प देखी है वो ऐसा घिनौना काम कभी नहीं करसकता. दीदी कभी सुनेल भाई के दिल की हालत को समझने की कोशिश करी. जिसे अपनी आंटी समझते आए जिंदगी भर वो उसकी आंटी नहीं निकली, कभी सोच के देखो ये सब आपके साथ होता तो क्या गुजरती दिल पे. महीनों कोमा में पड़े रहे सुनील पे होने वाले वार को अपने उप्पर ले लिया, इतना भी नहीं किया के सुनील को वॉर्न करे, पुलिस में कंप्लेंट करे, बस अकेले झुझते रहे जिंदगी की परेशानियों से. ऐसा भाई तो किस्मत वालों को मिलता है. और कभी ये सोचा क्या गुज़री होगी उसके दिल पे जब ये पता चला के उसकी असली आंटी अब उसके जुड़वा भाई की बीवी है , उसकी बड़ी बहन उसके जुड़वा भाई की बीवी है, उसकी वो मासी जिसने आंटी की तरह उसकी देखभाल की वो उसके जुड़वा भाई की बीवी बन गयी. सारे रिश्ते जिनकी पनाह में वो जीने आया था वो सब बदल गये. क्या इनको (सुनील) को भाई बोल पाएगा, अगर सूमी दीदी को आंटी बोलता है तो सुनील उसका अंकल बन गया, अगर सुनील को वो भाई बोलता है तो उसकी आंटी उसकी भाभी बन गयी. सोचो क्या गुजर रही होगी उसपर.

सोनल और सूमी खामोश पत्थर सी बन जाती हैं. सुनील उनके दिल में इतना बसा हुआ था के सुनेल के दर्द का अहसास छू तक नहीं रहा था.

सोनल : ये सब तो उस उप्परवाले की मर्जी से हुआ, ना अंकल सुनील को आंटी को अपनाने को बोलते, ना मेरे दिल में उसके लिए वो प्यार पनपता तो ये सब नहीं होता. पर होनी को कुछ और मंजूर था, हम सब का एक होना विधि के विधान ने खुद निश्चित कर रखा था.

रूबी : और उसकी सजा सुनेल को मिले क्यों ?

तर्क वितर्क शुरू हो गये, पर कोई हाल ना निकला . काऊर किसी का भी नहीं , पर सजा तो एक को मिल ही रही थी, जिसका समाधान अगर कोई कर सकती थी तो बस सुनेल की आंटी या बड़ी बहन हाँ उस रूप में उसे अपने भाई को खोना पड़ता और वक्त ने ये फैसला भी सुनेल के हाथों में रख दिया – वो किसे चुनता है – आंटी और बहन को या अपने जुड़वा भाई को.

सुनील जिसके अंदर अब सुनेल समा चुका था उसने एक नज़र सुनेल पे डाली जैसे कह रहा हो यार माफ करना जरूरी था, ये जंग तेरे बस की नहीं और मुझे तेरे जिस्म का सहारा चाहिए.

सुनील आइक्यू से बाहर निकला तो उसका सामना विजय से हो गया. विजय को सुनेल कुछ बदला सा लगा पर शायद थकान और चिंता का असर होगा ये सोच उसने कोई ध्यान नहीं दिया.

विजय : आओ सुनील, चलो उधर चल के बैठते हैं, फिर सारी बात बताओ. सुनील कुछ नहीं बोला बस साथ हो लिया.
विजय : हाँ सुनील, अब सारी बात शुरू से बताओ, क्या माजरा है ये. ये प्रोफ. कोन है, और सभी के साथ क्या हुआ उसका तो कुछ आता पता नहीं चला, सुनेल एका एक लंडन से कैसे आया.

सुनील ( सुनेल) कुछ देर चुप रहा. ‘ सब कुछ पता चल जाएगा अंकल, अभी….

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