वो शाम भी अजीब थी, ये शाम भी अजीब है – भावनाओं का युद्ध – Emotional Saga – Part2 -144

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मुझे उस जगह पहुँचना है जहाँ आक्सिडेंट हुआ था, वक्त बहुत कम है.

विजय को सुनील की आवाज़ कुछ बदली लगी. पर चुप रहा और उसे साथ ले उस जगह की तरफ चल पड़ा अपनी कार से जहाँ गाँव वालों ने बताया था की आक्सिडेंट हुआ था. कार चलते वक्त विजय का ध्यान बार बार सुनील की आँखों पे जा रहा था उनमें एक ऐसी चमक सी थी जो उसने पहले कभी नहीं देखी थी, बहुत से सवाल विजय के मान में खड़े हो गये थे पर कुछ जवाब ना था, उसे इंतजार था उस पल का जब सुनील उसे सब कुछ बताता.

कार जब उस स्थान के पास पहुँची तो सुनील कार से उतरा, ‘ आप कार को यहाँ से 500 मीटर पीछे ले जाओ, और कुछ भी हो, कार से बाहर मत निकलना. मैं फिर कह रहा हूँ, कुछ भी हो कार से बाहर मत निकलना’

उस जगह से थोड़ी दूर सरक पे एक छोटा सा मंदिर था. सुनील उस मंदिर के सामने जा के बैठ गया और ध्यान लगाने लगा. विजय सुनील के कहे मुताबिक कार पीछे ले गया.

जैसे जैसे सुनील (सुनेल) का ध्यान गहरा होने लगा आसमान पे काले बादल चढ़ने लगे बहुत जोरों की गड़गड़ाहट होने लगी और यकायक एक दम तेज बारिश शुरू हो गयी , जिसका नतीजा ये हुआ के आपास्स जो मिट्टी के देर थे वो पानी में घुलने लगे. सुनील बिलकुल भी विचिलीट नहीं हुआ और तेज तूफानी बरसात में यूँ ही ध्यान लगाए रहा. कार में बैठा विजय दूर से सब देख रहा था. बारिश इतनी तेज होने लगी थी के वो कार से बाहर नहीं निकल सकता था. कुछ ही देर में बारिश थाम गयी और सुनील के चारों तरफ एक सफेद धुआँ फैलने लगा वो धुआँ सुनील को उड़ा ले जाना चाहता था पर सुनील वहीं जमा रहा.

कुछ पलों बाद जब सुनील का जिस्म उखाड़ने लगा तभी अचानक एक आकृति उबरी और सुनील के जिस्म में समा गयी. इधर ये आकृति उबरी उधर सुनेल का जिस्म बेजान हो गया पर कोई शक्ति अब भी उसके दिल की धड़कन को चला रही थी. डॉक्टर्स हैरान हो गये. सुनेल का जिस्म बरफ की तरह ठंडा हो चुका था, जिस्म की सारी लाली गायब हो चुकी थी. सुनेल को कोमा में घोषित कर दिया गया, जिस्म बिलकुल बेजान था पर दिल धड़क रहा था. और दिल की धड़कन भी गैर मामूली थी यूँ लगा रहा था अभी रुकी अभी रुकी. डॉक्टर्स ने कुछ जान बचाने वाले इंजेक्शन लगाए जिन से दिल की धड़कन बाद जाए , पर कुछ असर ना हुआ और डॉक्टर्स ने सब वक्त पे छोड दिया.

यहाँ जैसे ही वो आकृति सुनील के जिस्म में समाई, सुनेल जो उस वक्त सुनील के जिस्म में था उसे ताक़त मिल गयी और वो अपनी साधना में लीं रहा वो तूफान और ज़ोर का उठा पर सुनील(सुनेल) का कुछ बिगड़ ना सका.

काफी उत्पात के बाद वो तूफान शांत हो गया एक सफेद धुएँ की लाकीर यकायक लूप्त हो गयी.

सुनील ने अपनी आँखें खोली और इधर उधर छानबीन करने लगा.

उसे प्रोफ. का ब्रीफकेस मिल गया , लपक के उसने वो उठाया और बिजली की गति से दोधता हुआ विजय की तरफ भगा . विजय ने उसे आता देख कार स्टार्ट करी और सुनील के बैठते ही तूफानी गति से वहाँ से निकल पड़ा.

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सुनील ने ब्रीफ केस में से दो मालाएँ निकली और विजय को दी. एक उसने वहीं उसी वक्त विजय को पहनने को कहा और एक हॉस्पिटल पहुँच सुनेल को पहनने को कहा फिर वो रास्ते में कहीं उतार गया और नज़दीक किसी शमशन घाट पे चला गया.

वहाँ पहुँच उसने वहाँ के करम चारी से एकांत में कोई जगह माँगी जहाँ उसे कोई तंग ना करे और उस स्थान पे जा कर वो बैग में से डाइयरी निकल के पड़ने लग गया. जैसे झासे वो डाइयरी पड़ता गया उसके रोंगटे खड़े होते चले गये.

क्या था उस डाइयरी में , ये जाने के लिए करे अगले अपडेट का इंतजार.
कमरा कहो या हॉल क्म जगह सीलन से भारी थी और बहुत तेज दुर्गंध आ रही थी जैसे सेकड़ों मान माज़ के लोतड़े जल रहे हूँ परेशान रहे हूँ. और उसी हॉल के एक कोने में एक पत्थर की टीला सी थी जिसपे हाथ पैर से बँधी सभी लेती हुई थी. इस वक्त वो बेहोश थी उसके जिस्म में कोई हरकत नहीं हो रही थी.

वहीं पास एक लंगड़ी आकृति खड़ी थी जो बहुत ही नफरत से उसे देख रही थी.

‘अब पता चलेगा तुझे, जिंदगी कितनी कड़वी हो सकती है, मुझे छोड उस कुत्ते के साथ चली गयी थी, मेरी जान को मुझ से दूर कर दिया था, कोई नहीं बचेगा अब और तेरे सामने अपनी जान को पा कर रहूँगा यहीं तेरे सामने …हां हां हां हां और तू मेरे गुलाम की दासी बनेगी हां हां हां हां’ कमरे में भयानक हंसी गूंजने लगी जिसे सुन वो आकृति भी घबराने लगी जो सभी को यहाँ तक लाने की जिम्मेदार थी.

इधर सुनेल (सुनील के जिस्म में) ध्यान लगा के शमशान घाट में बैठा था, उसका रब्टा उस आत्मा से हो गया जो प्रोफ की मदद करती थी, काफी देर दोनों की बात हुई और सुनेल ने मानसिक तरंगों से विजय को एक स्थान का पता दिया और जल्द वहाँ पहुँचने को को कहा, विजय ने तुरंत अपनी कार घुमाई और उस तरफ चल पड़ा.

आवेश में सुनेल ये भूल गया था की सुनील की आत्मा वापस अपने जिस्म में आ चुकी है और उसी ने उसकी मदद करी थी.

वो आत्मा जो प्रोफ की मदद करती थी वो भी स्निल के जिस्म में समा गयी और कुछ ही पलों में सुनील (सुनेल) वहाँ पहुँच चुका था जिस बिल्डिंग की बेसमेंट में सभी कैद थी.

वहाँ पहुँच वो उस बैग से कुछ समान निकल बिल्डिंग के चारों तरफ रखने लगा, वो आत्मा अब सुनील के जिस्म से बाहर निकल गयी थी और बिल्डिंग में घुस चुकी थी.

वो आत्मा जैसे ही अंदर घुस्सी, कमरे में फैली दुर्गंध खत्म हो गयी और एक मनमोहक महक फैल गयी .

‘न्‍न्‍ननणन्नाआआआआहहिईीईईईईईईईईईईईईईईईईईईई ‘ वो लॅंडी दिखने वाली आत्मा चिल्ला उठी और और विकास की आत्मा को राहत मिली वो दूध के उस आत्मा के कदमों में बैठ गया…

खत खत….

वो शाम भी अजीब थी, ये शाम भी अजीब है - भावनाओं का युद्ध - Emotional Saga

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