हॉंटेड – मुर्दे की वपसी – 284

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मेरे ऐसे कोन बंद कर के ज़मीन पर गिर जाने की मजबूरी , मुझे मिलती वो तकलीफ थी जिनमें अलग अलग चीखें थी और वो मेरे कोन में घुस कर सीधे मेरे दिमाग पर हावी हो रही थी. वो चीखें जिनमें अलग अलग तरह की आवाजें थी जो दर्द में बिलख रही थी , इसके साथ साथ गिरते ही जब मैंने अपनी आँखें खोली और नजरें घुमाई तो देखा आंशिका का शरीर अभी होश में नहीं था पर फिर भी उचक – उचक कर दर्द भारी आवाज़ में चिल्ला रहा था. सर में घूम रही इतनी चीखों के बावजूद मेरे दिमाग में एक बात ये आई की अचानक से में ऐसे कैसे गिर गया , ऐसी कौन सी वजह ने मुझे गिरा दिया क्यों की कुछ देर पहले तक ख़ान के शरीर से निकलती आवाजें चुभ रही थी , दर्द दे रही थी पर जो मुझे अभी महसूस हो रहा है वैसा तब नहीं हो रहा था.

मैंने फौरन अपनी नज़र दूसरी तरफ घुमाई जहाँ पहले तो मेरी नज़र ख़ान के शरीर पर पड़ी जो उसी अंदाज़ में चिल्ला रही थी और फिर जैसे ही मेरी नज़र उसके आगे की तरफ भाई पर गयी तब दर्द झेल रहा शरीर भी एक पल के लिए शांत हो गया.

सामने हर्ष घुटनों के बाल बैठा अजीब सी आवाज़ में चीख रहा था एक अजीब सी शैतानी आवाज़ थी जो की सिर्फ़ एक आवाज़ नहीं थी बल्कि बहुत सारी आवाज़ थी , जैसे पूरे ब्राहमद का दर्द उसके मुंह से निकल रहा हो. कुछ पल में उस आवाज़ को ध्यान से सुन-ने लगा , कोन और नाक से बहता खून ज़मीन पर कब गिरने लगा पता ही नहीं चला लेकिन जब कुछ देर तक वो आवाज़ ध्यान से सुनी तब इस खेल के एक और भयानक चेहरे से परदा हटा.

जो आवाजें , जो दर्द में बिलखती चीखें इस वक्त मेरे सर में घूम रही है और मुझे तोड़ रही है वो असल में वो दर्द है जो ख़ान की शैतानी रूह ने ज़िंदगियुं को दिए हैं और इस त्रिशूल के ख़ान के शरीर में घुस जाने से उस दर्द को वो इस वक्त खुद महसूस कर पा रहा है क्यों की वो खुद एक शरीर के अंदर कैद है. वही दर्द वो आज खुद महसूस कर रहा है जो उसने बाकी ज़िंदगियुं को दिया है यानि की जब तक वो भाई के शरीर में रहेगा तब तक वो इस दर्द को महसूस करता रहेगा यानि ये भी उसकी कमज़ोरी का हिस्सा है लेकिन …

लेकिन ये क्या ये उसकी कमज़ोरी मुझे भी महसूस हो रही है , मेरा सर , मेरा शरीर , में अपने पैर महसूस नहीं कर पा रहा हूँ … नहीं.. मेरा पैर… मेरा पैर … मुझे महसूस क्यों नहीं हो रहा. मैंने अपनी नजरें अपने पैरों की तरफ की जहाँ मैंने बहुत कोशिश की उसे हिलने की पर वो नहीं हिला , वो हिला नहीं. हाथ भी कोन से अचानक फिसल गया जैसे मशीन ने काम करना बंद कर दिया हो. आँखें भाई के शरीर पर ही चिपकी हुई थी जो घुटनों के बाल बैठा मेरी तरफ देखता हुआ चीख रहा था उसके चेहरे पे मेरे से कहीं ज्यादा दर्द था इतना की शायद ख़ान की रूह अंदर से खुद रगड़ती हुई उसे तड़पा रही थी. पर अब ये क्या हो रहा है में कुछ सोच क्यों नहीं पा रहा , दिमाग में सोच की जगह सिर्फ़ ये चीखें ही सुनाई दे रही है . मुझे मेरे दिल की धड़कने की भी आवाज़ नहीं सुनाई दे रही , क्या में सुनाने की शक्ति खोता जा रहा हूँ , नहीं नहीं ऐसा होता तो में इन चीखों को कैसे सुन पा रहा हूँ. क्या में ये चीखें सिर्फ़ इसलिए सुन पा रहा हूँ क्यों की वो मेरे दिमाग में बस चुकी है…

लेकिन में अपना दिमाग महसूस क्यों नहीं कर पा रहा , अपनी हिलती उंगली क्यों महसूस नहीं कर पा रहा. मैंने अपनी उंगलीयू को हिलाया पर ऐसा लग रहा था वो मेरे शरीर से जुड़ी ही नहीं है . मुझे आंशिका को देखना चाहिए पर कैसे देखूं मेरी गर्दन नहीं हिल रही , नहीं… कहीं उसके साथ भी तो ऐसा नहीं हो रहा , अगर उसका दिल ऐसे में बंद हो गया तब.. नहीं मुझे फौरन कुछ करना पड़ेगा. पर कैसे करूँ मेरा दिमाग मुझे ही महसूस नहीं हो रहा है .

आँखें भाई से हाथ कर ख़ान की लाश पर गयी और उसे में घूरता रहा पर समझ नहीं आया की क्या करूँ क्यों की दिमाग महसूस ही नहीं कर पा रहा था , जनता हूँ बहुत आसान रास्ता है पर सोच नहीं पा रहा वो क्या है. मेरा दिमाग मेरा साथ ही नहीं दे रहा . क्या करूँ , कैसे करूँ.. कुछ तो करना ही होगा पर क्या …

हाँ मेरा दिमाग सुन था , महसूस नहीं हो रहा था पर मुझे इतना पता था की मुझे दिखाई दे रहा है में सामने घाट रही चीज़ देख सकता हूँ , जैसे मुझे मेरी हिलती उंगली दिख रही थी और उसके साथ बगल में लेटी ख़ान की लाश जो चिल्ला रही है पर इन हिलती उंगली से मुझे क्या करना है नहीं जनता .. क्यों की में सोच ही नहीं पा रहा की मुझे क्या करना है . दिमाग में सिर्फ़ वो चीखें ही थी इसलिए सोचने के लिए कुछ नहीं था पर जैसे मुझे ये महसूस हो रहा था की में सांस ले रहा हूँ उस तरह से मुझे ये भी महसूस हो रहा था की सामने उस त्रिशूल को पकड़ना है इसलिए उन हिलती उंगलीयुं से मैंने उसे पकड़ लिया.

जैसे ही त्रिशूल ने उंगली को छुआ , मारा हुआ शरीर अजीब तरह से जिंदा हो गया और उसके जिंदा होते ही पहली आवाज़ दिमाग में आई ‘ निकल इसे बाहर.. ‘ आवाज़ के साथ ही मैंने त्रिशूल को बाहर खींच दिया और उसके बाहर खींचते ही ऐसा लगा जैसे शरीर पर से बड़ा भोज उतार गया हो , उसके साथ ही शांति हो गयी…

पर जहाँ शांति होती है वहीं तूफान दस्तक देता है….

त्रिशूल के बाहर निकालने पर ख़ान की लाश शांत हुई , वो आवाजें बंद हुई पर कुछ और चीज़ जो बंद हो जानी चाहिए थी वो चालू हो गयी. मेरी आँखों के सामने आसमान में अजीब झलकियाँ आने लगी , मानो आसमान एक ना हो बल्कि कई हो और उसमें अलग अलग परछाई जिसे समझ पाना मेरे लिए नामुमकिन था . आँखों में त्रिशूल की चमक पड़ने पर में अपनी जगह से फौरन उठ खड़ा हुआ की तभी भाई मेरे चेहरे के बिलकुल करीब आया और अचानक से आ ही उसने मुझे धक्का दे दिया जिसके देते ही में पीछे की तरफ गिर गया.

उसने फौरन ख़ान की लाश को उठाया , में जनता था इस वक्त वो मुझे मर नहीं सकता इसलिए वो एक ही चीज़ हासिल करना चाहेगा की बस किसी तरह वो यहाँ से बाहर निकल जाए क्यों की जो वक्त वो चाहता था वो आ ही चुका था और अगर वो एक बार ख़ान का शरीर लेकर बाहर निकल गया तो खेल खत्म .. सचाई की हर और बुराई के वक्त की जीत पाक-की….

लेकिन में रोक सकता था , रोक सकता था नहीं बल्कि रोकुंगा और उसके लिए मुझे बस एक ही चीज़ करनी थी जो में करना नहीं छा रहा था लेकिन इसके अलावा अब मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था और ना ही सोचने का वक्त था.

में फौरन उठा , भाई लाश उठा के जाने के लिए मुड़ा इतने में मैंने वो कर ही दिया जो शायद पहले कर देता तो कहानी यहाँ तक आती ही नहीं पर करता भी कैसे मौका ही नहीं मिला था पर अब मिल चुका था और अब वक्त भी सही था , कहते हैं ना सही वक्त आने पर ही कोई अधूरा काम पूरा होता है तो लो कर दिया मैंने वो अधूरा काम पूरा क्यों की मौका मेरे हाथ में था और मैंने वक्त के साथ मिल कर उस मौके को जाने नहीं दिया.

” अरर्ग्घह….. ” मैंने दम लगा कर त्रिशूल को भाई की तरफ फेंका और फिर एक ही पल के अंदर त्रिशूल भाई के जाने से पहले ही उसकी पीठ के अंदर जा घुसा.

” आआआआआआआआआआआआआअरर्रहररगह… ” जैसा मुझे विश्वास था वो जोरों से दाहदा , दर्द में चिल्लाया , मेरी तरफ घुमा और मुझे गुस्से भारी आँखों और भाव से देखते हुए चिल्लाने लगा. उसके हाथ में ख़ान की लाश थी , वो उसे लेकर मेरी तरफ बढ़ा पर जो शक्ति उसके अंदर घुसी थी वो कहीं ज्यादा थी इसलिए वो ज्यादा देर नहीं टिक पाया और वहीं घुटनों के बाल गिर गया और उसके हाथ से ख़ान की लाश गिर गयी. वो उसी अंदाज़ में चिल्ला रहा था जैसे जब चिल्लाया था जब मैंने ख़ान की लाश में त्रिशूल घुसाया था पर इस बार ये फर्क था की वो आवाज़ मुझे तकलीफ नहीं दे रही थी.

में उसके करीब गया , वो मुझे अपने हाथ से पकड़ने की कोशिश कर रहा था लेकिन वो नाकाम हो रहा था. मैंने उसकी पीठ की तरफ देखा जहाँ वो त्रिशूल मेरी आँखों के सामने उसके शरीर में समा गया और जैसे ही वो अंदर गया , भाई और ज़ोर – ज़ोर से चीखने लगा और ज़मीन की तरफ पेंट के बाल गिर गया. मुझे इस बात का बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं था की त्रिशूल का असर ऐसा होगा क्यों की इस बात पर बाबा ने कुछ नहीं बताया था. इसलिए में जल्दी से जल्दी इसे पहले ख़ान की रूह उस त्रिशूल की शक्ति से आज़ाद हो उसे पहले मुझे अपना असली काम करना था क्यों की में जनता था इस त्रिशूल से ख़ान की रूह खत्म नहीं हो सकती पर थाम सकती है लेकिन कभी ये नहीं सोचा था की वो त्रिशूल मुझे भाई के शरीर में घुसना पड़ेगा पर अब ये हो चुका था और अब मुझे अगर उसे या सब कुछ बचना था ख़ान के शरीर को उसकी सही जगह पहुँचना था और मैंने वैसा ही किया…

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