आख़िर आंटी चुद ही गयी – Meri Chudai Auny Ke Sath – Part – 35

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करने की सोचना भी अपने आप मैं किसी बड़े गुनाह से कम नहीं था। एक दूसरे के इतना करीब आने के बावजूद, एक दूसरे में समां जाने की उस तीव्र इच्छा के बावजूद, उस लक्ष्मण रेखा को पार करने के बावजूद दोनों माँ वेटा असहज महसूस नहीं कर रहे थे। उनके अंदर घृणा,गलानी जैसी किसी भवना ने जनम नहीं लिया था। क्योंके उस आकर्षण ने जिसने एक तगड़े युवक और एक अत्यंत सुन्दर नारी को इतना करीब ला दिया था उसी आकर्षण ने माँ लड़के के रिश्ते को और भी मजबूत कर दिया था उनके प्यार को और भी प्रगाढ़ कर दिया था।

विशाल जिसने अभी अभी अपनी माँ के हुसन और जवानी से लबरेज जिस्म के दीदार किये थे अपने पूरे जिस्म में रोमांच और अवेश के सैलाब को महसूस कर रहा था। अंजली के नग्न जिस्म ने उस प्यास को और भी तीव्र कर दिया था जिसने कई रातों से उसे सोने नहीं दिया था। उसने कभी उम्मीद नहीं की थी के उसकी माँ सच में उसके साथ नग्नता दिवस मानाने के लिए तैयार हो जायेगी। वो तो उसे जानबूझ कर उकसाता था के वो पता कर सके उसकी माँ किस हद तक जा सकती है और अब जब उसकी माँ ने दिखा दिया था के उसके लिए कोई हद है ही नहीं तोह विशाल को अपने भाग्य पर यकीन नहीं हो रहा था। सोचते सोचते अचानक विशाल मुस्करा पढता है। वो उठकर खड़ा होता है और अपनी कमर से तौलिया उठाकर फेंक देता है। आसमान की और सर उठाये वो अपने भयंकर लंड को देखता है जिसका सुपाड़ा सुरख़ लाल होकर चमक रहा था। आज का दिन विशाल की जिंदगी का सबसे यादगार दिन साबित होने वाला था इसमें विशाल को रत्ती भर भी शक नहीं था। विशाल मुस्कराता कमरे से निकल सीढिया उतरने लगता है और फिर रसोई की और बढ़ता है यहां उसका भाग्य उसका इंतज़ार कर रहा था।

अनजी विशाल के कदमों की आहट सुनती है तो उसके होठों पर फिर से मुस्कराहट फैल जाती है. उसका चेहरा मच और सुराख हो उठता है, वो अपने जिस्म की नस नस मैं चाय उस उत्तेजना से सहरान सी महसूस करती है. उत्तेजना का ऐसा आवेश उसने शायद जिंदगी मैं पहली बार महसूस किया था. उत्टीजना का वो आवेश और भी तीव्र हो जाता है जब आंटी महसूस करती है के उसका बेटा उसे किचन के दरवाजे मैं खड़ा घूर रहा है.

विशाल रसोई की चौखट पर हाथ रखे अपने सामने उस औरत को घूर रहा था जिसे उसने जिंदगी मैं हज़ारों बार देखा था. अपने जिंदगी के हर दिन देखा था. कभी एक आम घरेलू गृहन्क की तेरह तो कभी एक पतिव्रता पत्नी की तेरह अपनी सेवा करते हुए तो कभी ममता का सुख बरसते हुए एक स्नेहिल, प्यारी आंटी की तेरह. जिंदगी के भविंन किरदारो को निभाती वो औरत हमेशा एक पर्दे मैं होती थी. वो परदा सिर्फ़ कपड़े का नहीं होता था बल्कि उसमें लाज, शर्म, समाज और धर्म की मान मर्यादा का परदा भी सामिल था, मगर आज वो औरत बेपर्दा थी. शायद एक गृहणी का, एक पत्नी का बेपर्दा होना इतनी बड़ी बात नहीं होती मगर एक आंटी का नंगी होना बहुत बड़ी बात थी. और बेटा अपनी नंगी आंटी की खूबसूरती मैं खो सा गया था. महज खूबसूरत कह देना शायद अंजलि के जानलेवा हुस्न का अपमान होता. उसका तो अंग अंग तराशा हुआ था. विशाल की आंखें आंटी के जिस्म के हर उतार चढ़ाव, हर कटाव पर फिसलती जा रही थी. उसकी सांसों की रफ्तार उसकी दिल की धड़कनों की तरह तेज होती जा रही थी. उसे खुद पर आश्चर्य हो रहा था के उसका ध्यान अपनी आंटी की खूबसूरती पर पहले क्यों नहीं गया.

“अब अंदर भी आयोगे जा वहाँ खड़े खड़े मुझे घूरते ही रहोगे” अंजलि डाइनिंग टेबल पर प्लेट रखती हुई कहती है और फिर कप्स मैं चाय डालने लगती है. विशाल के चेहरे से, उसकी फैली आंखों से, उसके झटके मरते कठोर लंड से साफ साफ पता चलता था के वो अपनी आंटी की कामुक जवानी का दीवाना हो गया था.

“मैं तो देख रहा था मेरी आंटी कितनी सुंदर है” विशाल अंजलि की तरफ बढ़ते हुए कहता है.

“ज्यादा बातें ना बनायो…मुझे अच्छी तेरह से मालूम है मैं कैसी दिखती हूँ….” अंजलि टेबल पर चाय रखकर सीधी होती है तो विशाल उसके पीछे खड़ा होकर उससे चिपक जाता है. विशाल अपनी आंटी की कमर पर बहन लपेटाता उससे सात जाता है. त्वचा से त्वचा का स्पर्श होते ही आंटी लड़के के जिस्म मैं झुरजुरी सी दौड़ जाती है.

“उम्म्म क्या करते हो…थोड़ी ना……” विशाल के लंड को अपने नितंबों मैं घुसते महसूस कर अंजलि के मुँह से सिसकी निकल जाती है.

“आंटी तुम सच मैं बहुत सुंदर हो…..मुझे हैरानी हो रही है आज तक मेरा ध्यान क्यों नहीं गया के मेरी आंटी इतनी खूबसूरत है” विशाल अंजलि के पेट पर हाथ बाँध अपने तपते होंठ उसके कंधे से सटा देता है. उधर उसका बेचैन लंड अंजल्ज के दोनों नितंबों के बीच झटके कहा रहा था. विशाल अपनी कमर को थोड़ा सा दबाता है तो लंड का सूपड़ा छेद पर हल्का सा दबाव देता है. अंजलि फिर से सिसक उठती है.

“उन्न्नह…….तुम आजकल के छोकरे भी ना, बहुत चालक बनते हो……सोचते होगे थोड़ी सी….

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