मेरी सलोनी – एक प्रेम कहानी – 46

0
928

उतार के दरवाजा के अंदर चलो & याद रहे कोई चालाकी मत दिखना वरना यही ढेर कर दी जाओगी.”,सलोनी जानती थी की वो बुरी तरह फँस गयी है & उस शख्स की बातें मानने की लावा उसके पास & कोई चारा नहीं.मकान के अंदर घुसते ही उस शख्स ने उसे 1 कुर्सी पे बैठने को कहा & फिर उसे उस से बाँध दिया.

“तुम चाहते क्या हो?कौन हो तुम?..आख़िर मुझे यहां बंद क्यों किया है?”,वो शख्स सिगरेट सुलगते हुए मुस्करा रहा था.

“तुमहरा नाम सलोनी है?”

“हाँ,लेकिन..-“,उसने हाथ उठा उसे खामोश रहने का इशारा किया.

“तुम्हारी मां का नाम सुमित्रा था?”

“हाँ.”

“तुम उसके साथ गोपालपुर नाम के कस्बे में रहती थी?”

“हाँ.”,कई दीनों में पहली बार उस शख्स को सुकून मिला था.उसकी तलश अंजाम तक पहुँच गयी थी.यही थी उस कामिनी की बेटी!उसने सिगरेट फेंकी,उसकी आंखों में खून उतार आया था & इतने दीनों से अंदर उबाल रहा गुस्सा अब बस फोटो पंडा चाहता था.वो तेजी से आगे बढ़ा & सलोनी का गला दबाने लगा.

“उउन्नगज्गघह..चोदो..!”,सलोनी के गले से आवाज़ भी नहीं निकला रही थी.

“गलती तुम्हारी नहीं है..गलती तो तुम्हारी कामिनी मान की है..लेकिन क्या करे मुझे इंटेक़ाम लेना है & वो मक्कार तो मर गयी.अब मां-बाप के कर्ज ओउअलड नहीं उतरेगी तो & कौन उतरेगा!”,वो शैतानी हँसी हंसा & सलोनी का गला छोड दिया.सलोनी बुरी तरह खांसने लगी,”..लेकिन घबरा मत.तुम्हारी मौर्त इतनी जदली & इतनी आसान नहीं होगी.14 बरस गुजरे हैं जेल में & उसके बाद भी बहुत धूल फंकी है.उस सब की कीमत तो तुम्हें ही चुकानी है.”

“लेकिन तुम हो कौन?..& मेरी मान ने क्या बिगाड़ा था तुम्हारा?..वो बहुत भली औरत थी..तुम्हें कोई ग़लतफहमी हुई है..!”,सलोनी का गला दुख रहा था.

“चुप!वो मक्कार थी.अपने रूप & बताओ के जाल में मेरे बाप को फँसा के मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी & खुद ऐश करने लगी दयाल के साथ!”

“बकवास मत कर,कमीने!मेरी मां के बारे में अनप-शनाप मत बोल,हरमज़ड़े!”,मां के बारे में उल्टी-सीधी बातें सुन सलोनी को गुस्सा आ गया.

“तड़क्कककक..!”,उसने 1 करारा तमाचा सलोनी के गाल पे रसीद किया,”..तू भी उस हराम की कमाई पे ही पाली-बढ़ी है ना..तुझे तो अब सजा जरूर मिलेगी.”,वो दोबारा उसका गला घोंटने लगा,”..मेरे बाप पैसे चुरा के भागी थी वो दयाल के साथ. मेरा बाप उस से प्यार करता था & शादी कमरा चाहता था लेकिन वो कामिनी मेरे पैसे लेकर भाग गयी मेरे बाप के दोस्त के साथ!

““तुम्हें पता है तुम्हारा बाप कौन है?”

“नहीं.जो भी था 1 डरपोक,बुज़दिल &घटिया किस्म का इंसान था जो मेरी मां के पेट में मुझे डालने की हिम्मत तो रखता था लेकिन उसे & मुझे अपननए की नहीं.”,सलोनी की रुलाई अब धीमी हो गयी थी..तो सुमित्रा ने उसे ये बात तो सही बताई थी.
“मेरा नाम देवेन सिन्हा है मैं गोपाल सिन्हा का बेटा हूँ.तुम्हारी मां को मेरे पिता ने पहली बार गोपालपुर के पोस्ट ऑफिस में देखा था..”,और उसने 1 कुर्सी खींची & बैठ गया & 1 नयी सिगरेट सुलगाई,”और उसे देखता ही रही गया था.उस वक्त तुम भी उसकी गोद में थी.हल्की गुलाबी सारी में लिपटी तुम्हें गोद में ली सुमित्रा को देख पहली बार मेरे बाप दिल में शादी का ख्याल आया था..उसने सोचा की कस उनकी भी ऐसी 1 बीवी हो तो जिंदगी कितनी सुहानी हो जाए..”

“..उसके बाद इत्तफाक कहो या कुच्छ और वो उससे कई बार टकराया & उनकी जान-पहचान हो गयी.चाँद मुलाक़ातो में ही उन्होंने इरादा कर लिया की सुमित्रा को मैं अपनी बनाऊंगा & 1 दिन अपने दिल की बात गोपाल ने तुम्हारी मां से कह दी.उसने कोई जवाब नहीं दिया & उससे मिलना छोड दिया.उनकी हालत तो दीवानों जैसी हो गयी & तब उन्होंने दयाल का सहारा लिया..”,सलोनी ने देखा की उसकी मां के बारे में बात करते हुए उस शख्स की आंखों में नर्मी आ गयी थी लेकिन दयाल नाम को लेते ही वो फिर से अपने पुराने अंदाज़ में आ गया था.

“..दयाल मेरे बापका दोस्त था.सब कहते थे की वो चलता पुर्ज़ा & निहायत शातिर आदमी है लेकिन मेरे बाप साथ उसने कभी कोई धोखाधड़ी नहीं की थी & हमेशा मदद ही करता था.तुम्हारी मां से भी उनकी दोबारा बात करवाने में उसने बहुटी मदद की ही.

“..उनकी माली हालत बहुत अच्छी तो थी नहीं & वो नहीं नहीं चाहता था की शादी के बाद तुम्हारी मां काम करे लेकिन उसके लिए उसे पैसों की जरूरत थी.तब दयाल ने उसे रास्ता दिखाया जो उस वक्त तो लगा की उनकी खुशली की ओर जाता है पर बाद में मुझे पता चला की वो रास्ता तो उनकी बर्बादी की तरफ जाता है & उसे बताने वाला शख्स उनका दोस्त नहीं बल्कि दोस्ती का नक़ाब पहने 1 दुश्मन है.”,उसने सिगरेट फर्श पे फेंक के उसके तोते को जुटे से मसला & सलोनी को देखने लगा.

“अब मैं तुम्हें बताने झड़ रहा हूँ की कैसे उनके दोस्त & उनकी महबूबा ने मुझे धोखा दिया & उसकी सजा आज तुम्हें भुगतनी पड़ रही है..-“

“-..1 मिनट.उनकी मां दोषी नहीं है.”

“ये तुम कैसे कह सकती हो?तुम्हें तो उस वक्त कोई होश भी नहीं था?”

“पहले तो आजतक उन्होंने किसी दयाल नाम के शख्स के बारे में ना तो सुना ना ही देखा & फिर वही बात की अगर मेरी मां ने आपके पिता को धोखा दिया तो फिर हम दोनों को अपनी जिंदगी उस गरीबी में क्यों गुजारनी पड़ी.”,अब वो शख्स सचमुच सोच में पड़ गया.जब वो कई बरसों बाद गोपालपुर गया था & पता किया था तो पाया था की सुमित्रा 1 छोटे से मकान में ही रहती थी & वो भी किराए पे.उसके बारे में उसने बहुत जानकारी जुटाई थी & यही पता चला था की वो निहायत शरीफ औरत थी & उसके चल-चलन पे कभी कोई 1 उंगली भी नहीं उठा सका था लेकिन उसके इंटेक़ाम की आग से झुलस रहे दिलोड़िमघ ने उस बात को मानने से इनकार कर दिया था.

“हो सकता है दयाल ने बाद में उसे भी धोखा दिया हो & उसके हिस्से का रुपया उसे ना दिया हो?”,इस बार उसके सवाल में वो शिद्दत नहीं थी.सलोनी की बताओ ने उसकी सोच को हिला दिया था.

“मान ली तुम्हारी बात लेकिन अगर उनकी मां की फ़ितरत ऐसी थी तो उसने फिर किसी & मर्द से यारी क्यों नहीं गाँठि या फिर किसी और के पैसे क्यों नहीं हड़पे?”,सलोनी उसकी आंखों में बेबाकी….

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here