मेरी सलोनी – एक प्रेम कहानी – 47

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से देख रही थी.देवेन को वहां ज़रा भी झूठ नज़र नहीं आ रहा था मगर..

“मैं 1 बहुत मतलबी लड़की हूँ जो अपनी खुशी के लिए किसी भी हद तक गिर सकती है मगर उनकी मां 1 देवी थी.आपने शुरू में उसे बिलकुल सही समझा था..आप चाहे तो मुझे मर दीजिए लेकिन मेरा यकीन मानिए..उस औरत को पूरी जिंदगी में कोई खुशी नहीं मिली.

“..तो आख़िर सच क्या है & दयाल आख़िर गया कहा?”

“हुआ क्या था जिसने आपकी जिंदगी तबाह कर दी?”

“बताता हूँ.”
दयाल सिंग कई छोटे मोटे गलत काम किया करता था एक दिन मेरे बाप ने और उसने एक बहुत बड़ा डाका डाला जब मेरे घर पे पैसे को बाँट रहे थे तभी उसने मेरे बाप को गोली मर दी और वहां से सब लेकर भाग गया .और अपने ही बाप को मरने के जुर्म में मैं 14 साल जेल में काटे, तब से मैड दोनों को ढूंढ. रहा हूँ.

“मैं फिर कहती हूँ की तुम्हें ग़लतफहमी हुई है.मुझे मरने से तुम्हें शांति मिलती है तो मर दो लेकिन ये सच नहीं बदलेगा की मेरी मां का तुम्हारी बर्बादी से कोई लेना-देना नहीं.”,2 घंटे पहले उसका इरादा पक्का था की वो इस लड़की को मर के अपना बदला पूरा करेगा लेकिन अब उसका विहवस दिग गया था.

“तो क्या दयाल & तुम्हारी मां साथ नहीं थे?”

“नहीं!..& कौन है ये दयाल आख़िर?..मैंने तो उसे कभी नहीं देखा!”

“ये है दयाल.”,उसने जेब से 1 तस्वीर निकल उसे दिखाई,”..ये सुमित्रा, ये है दयाल.”,1 गोरा-चीट्टा शख्स था जो शक्ल से तो बहला दिखता था लेकिन उसकी आंखों में 1 अजीब सी चमक थी जिसे तस्वीर में भी देख सलोनी थोड़ी असहज हो गयी.

“मैंने इस आदमी को कभी नहीं देखा ना ही मां ने कभी इसका कोई जिक्र किया.”,अब देवेन को कोई शक नहीं था की सलोनी को सच में कुच्छ नहीं मालूम था & शायद सुमित्रा भी निर्दोष थी.वो निढल हो कुर्सी पे बैठ गया. कुच्छ पल बाद वो उठा & उसके बंधन खोल दिए.सलोनी अपनी कलायो को सहलाती कुर्सी से उठी & उसके सामने खड़ी हो गयी.

“देखिए,मैं आपको नहीं जानती लेकिन आप मेरी मां को चाहते थे,उसे अपनाना चाहते थे,ये बात मेरे लिए बहुत मायने रखती है.मैं जानती हूँ,मेरी मां के साथ-2 इस दयाल की भी तलाश होगी आपको ..-“

“-..हाँ,लेकिन वो तो ऐसे गायब हो गया है जैसे गढ़े के सर से सींग!”

“उस सींग को ढूनडने में मैं भी आपकी मदद करूँगी.मेरी मां का नाम बदनाम करने वाले को मैं छ्चोड़ूँगी नहीं.”,वो हैरत से सलोनी को देखने लगा.

“मुझे माफ कर सकोगी..मैं अपने इंटेक़ाम की हवस में अँधा हो गया था..बुरा मत मना लेकिन पिछले कई बरसों से मैं सुमित्रा को दोषी मानता आ रहा हूँ & अभी भी अपनी सोच बदलने में मुझे परेशानी हो रही है..मेरा दिल तुम्हारी बताओ पे यकीन कर रहा है लेकिन दिमाग बार-2 मुझे सवाल करने पे मजबूर कर रहा है!”

“ये उलझन सिर्फ़ दयाल के मिलने से ही दूर हो सकती है.आप यकीन कीजिए अब से मैं भी आपके साथ हूँ.”

“शुक्रिया,चलो तुम्हें तुम्हारे घर तक छोड आऊँ.”

“हूँ.”

“ये घर आपका है?”,सलोनी कार में बैठी & इंजिन स्टार्ट किया तो वो हँसने दिया & बस इनकार में सर हिलाया.

“आप जेल से निकला गोपालपुर क्यों नहीं आए?”

“क्योंकि वहां से निकलते ही जेल का मेरा 1 साथी मुझे तमिल नाडु ले गया.मैंने वहां हर तरह का काम किया.मुझे इंटेक़ाम तो लेना था लेकिन अब मैं दोबारा जेल भी नहीं जाना चाहता था,मेरे उसी साथी ने मुझे पहले पैसे जमा करने की सलाह दी & फिर इंटेक़ाम लेने की.कुच्छ किस्मत ने भी मेरा साथ नहीं दिया.मैंने वहां जाने की कोशिश की थी लेकिन हर बार कुच्छ ना कुच्छ अड़ंगा लग जाता था.जब कामयाब हुआ तो पता चला की सुमित्रा अब इस दुनिया में है नहीं & दयाल गायब है.”

“आप अभी भी तमिल नाडु में ही हैं?..वहां काम क्या करते हैं आप?”

“नहीं.अब तो मैं गोआ में रहता हूँ & वही बिज़्नेस है मेरा.”

“अब आप क्या करेंगे?”,सलोनी का बुंगला नज़दीक आ रहा था & देवेन ने उसे कार रोकने का इशारा किया.

“अभी तो गोआ जाऊँगा..सलोनी..मुझे तुम्हें कुच्छ बताना है.”

“क्या?”,देवेन ने उसे कंधार फॉल्स पे देखी सारी बात बता दी.

“वो हरपल होगा. ”

“पता नहीं.मुझे उसकी शक्ल नहीं दिखी थी & दिखती भी तो मैं उसे पहचानता तो हूँ नहीं.”

“&सोनिया..वो लड़की मेरे ससुर के साथ आई थी..आपको पक्का यकीन है?”

“बिलकुल.मैंने दोनों को होटल वाय्लेट से 1 साथ कार में निकलते देखा था & झरने तक उनका पीछा किया था.”

“अच्छा.”,सलोनी सोच में पड़ गयी.कुच्छ गड़बड़ लग रही थी लेकिन क्या ये वो समझ नहीं पा रही थी.परेशानी ये थी की ये बात वो पुलिस को भी नहीं बता सकती थी क्योंकि ऐसा करने से देवेन बिना बात के इस चक्कर में फँस जाता.

“तो मैं चालू?”,देवेन ने कार का दरवाजा खोला.

“ओके.”,सलोनी मुस्कराई तो उसने उसे 1 कार्ड थमाया.

“ये मेरा नंबर है.”

“थेन्क यू.मैं आज ही घर जाकर मां की चीज़े देखती हूँ.हो सकता है उनमें कोई सुराग मिले.”

“हूँ..चलो,बायें.”

“बायें.”

सलोनी उस रात खूब सोई.उसने पूरी शाम अपनी मां के बारे में सोचा & देवेन के बारे में भी.देवेन के लिए वो 1 लगाव सा महसूस कर रही थी. उसने तय कर लिया की वो उसके घाव पे मरहम जरूर लगाएंगी & उस दयाल को खोज के रहेगी चाहे कुच्छ भी हो जाए.

अगली सुबह वो उठी तो उसे प्रणव का ख्याल आया.उसने उसे फोन करने की सोची लेकिन उस से भी पहले विक्की को फोन किया.विक्की ने उस से ढंग से बात नहीं की & मसरूफ होने का बहाना बनाया.उसके रवैया ने सलोनी के ट्रस्ट फिल्म्स को जाय्न करने के इरादे को & पुख्ता कर दिया.उसने प्रणव को फोन किया तो आज उसे भी बहुत काम था.उसने शॉपिंग जाने का इरादा किया & उसकी तैयारी करने लगी.

“हेलो..”,सलोनी ने 1 ढीली सी लंबी,सफेद स्कर्ट पहनी थी & काले ब्रा के ऊपर पूरे बाज़ुव की काली कमीज़ डाल उसके बटन्स लगा ही रही थी की प्रणव का फोन आ गया,”..मैं तो शॉपिंग जा रही थी..हाँ..पूरा दिन बिज़ी रहोगे क्या?..बहुत बुरे हो तुम..अभी तो विक्की भी नहीं है & तुम्हारे पास मेरे लिए वक्त ही नहीं है..हूँ..ओके,बायें!”,सलोनी ने मुस्कुराते हुए मोबाइल बंद किया..उसका नंदोई तो उसका दीवाना हो गया था!

“हाँ वो दिखाओ..”,दोपहर के 12 बजे डेवाले के नेहरू मार्केट में भीड़ होने लगी थी,”..इस मार्केट में हर समान की दुकाने….

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