वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया – 43

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अगर मैं तुम्हाइन ये सब बताता तो तुम मुझे माफ कर देती. मगर मैं खुद को कैसे माफ करता? क्या कभी मैं तुम्हारी आँखों मैं आंखें डाल सकता था? क्या कभी मुझ मैं इतनी हिम्मत होती के मैं नज़रैयण उठा कर उसे औरत की तरफ देख सकों जो मोहब्बत की बुलंदियों पर हो और मैं कहीं पास्तियों के बीच हूँ. क्या मैं कभी दोबारा अपनी जिंदगी मैं सो पता? नहीं मीना ये सब मेरे लिए मुमकिन ना था, इस लिए मैंने मौत को गले लगाया. वीरेंदर सिंग ऐसी जिंदगी नहीं जी सकता था, और अगर जीता भी तो उससे जिंदगी कहना गाली होता. मीना मैंने तुम से भी-पनाह मोहब्बत की है, कहते हैं के हर इंसान 7 बार जन्म लेता है. अग्गर भगवान मुझे कहे के मुझे 7 जन्म चाहयेन या तुम्हारे साथ गुजरने के लिए एक पल, तो मैं उन 7 जन्मों पे तुम्हारे साथ गुजरने वाले पल को चुनों गा. मुझसे चाहे जितनी नाराज़ होना, चाहे जितना बुरा भला कहना, मगर कभी मुझसे नफरत मत करना, वीरेंदर सिंग को मर कर भी ये बर्दाश्त नहीं होगा के उसकी मीना उसे से नफरत करे

अब तुम से विदा लेन के वक्त करीब आ रहा है, कैसी अजीब सी खाहिश दिल मैं पैदा हो रही है. जिंदगी मुझे ललचा रही है के कुछ पल और रुक जायों, एक बार तुम वापस आ जाओ तो एक बार तुम्हाइन और देख लोन. मगर मैं जानता हूँ के मैंने अगर तुम्हाइन एक बार और देखा तो मुझ मैं हिम्मत नहीं रहे गी अपनी जान लेन की, मैं कमज़ोर नहीं पड़ना चाहता. बस जाते जाते तुम से चाँद गुज़ारिशन हैं, मीना हमारे बचे को बहुत मोहब्बत देना, कभी उसे मैं वो कमियाँ ना पैदा होने देना जो मुझ मैं पैदा हुवें. मैं जानता हूँ तुम बहुत अच्छी मान बनो गी. मीना कभी इस घर को चोद के मत जाना, तुम यहाँ रहो गी तो मुझे इस बात का एहसास रहे गा के तुम मुझसे नाराज़ नहीं हो. तुम ने मुझे माफ कर दया. और आखिरी बात ये के मैं तुम्हाइन हमेशा खुश डैखहना चाहता हूँ, उसे मोहब्बत भरे हाथ को मत ठुकराना जो आज भी तुम्हारा मुंतज़ीर है. हमेशा मुस्कुराती रहना, इस उम्मीद के साथ के तुम मुस्कुरयो गी तो वीरेंदर सिंग मुस्कराए गा

तुम्हारा बाद-नसीब

वीरेंदर सिंग

आँसू थे के रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे. आज वीरेंदर सिंग को इस दुनिया से गये 1 महीना होने वाला था मगर आज भी जब वो ये खत पढ़ती तो दोबारा से उसकी आँखों से आँसू का झरना बहने लगा था. उसे ने पता नहीं कितनी बार ये खत पढ़ा था मगर उसके दिल को सकूँ नहीं आता था हर बार उससे लगता जैसे कोई लफ़्ज़, कोई बात हो शायद उसे खत मैं जो वो ना पढ़ पाई हो

“कितने जालिम हो तुम वीरेंदर. सारे फैसले खुद ही कर लिए, मुझसे पूछा तक नहीं के मैं क्या चाहती हूँ. क्या होता अगर तुम मुझे बता देते, क्या हो जाता? ज्यादा से ज्यादा तुम से कुछ दिन नाराज़ रहती मैं, तुम से ज्यादा नाराज़ होना तो मुझे कभी नहीं आया, तुम एक बार मुस्करा कर डैखहते तो मैं पिघल जाती. मगर ऐसी सजा तो ना देते, मौत से भी बाद-तार जिंदगी तुम ने मुझे दी है. अपनी जान भी नहीं ले सकती के मेरे अंदर तुम्हारा वजूद सांसें ले रहा है. ये कैसी मोहब्बत की तुम ने मुझसे वीरेंदर के इतना सा भरोसा भी ना कर सके. अपनी मीना पे थोड़ा सा ऐतबार भी ना कर सके के वो तुम्हाइन माफ कर देती. मेरी नजरों मैं कभी शिकायत नज़र आती तो फिर तुम हक़ पर होते अपनी जान लेन के मगर मुझे इस क़ाबिल भी ना समझा के एक बार आजमा ही लायटे अपनी मीना को”… वो उसे के खत को सीने से लगाए उसे से शिकवे कर रही थी. इतने मैं दरवाजे पे हल्की सी दस्तक दे कर यादव अंदर आ गया

“बेगम साहिबा, वो अभिनव साहब आप से मिलने आए हैं”

“उन्होंने बीतयो मैं आ रही हूँ”… उसे ने खुद को संभालते हुए कहा. अपने चेहरे को साफ करती वो नीचे आ गयी

“कैसी हो मीना?”… अभिनव के लहज़े मैं एक तड़प थी

“कैसी हो सकती हूँ वीरेंदर के बेघार? किसी पल को सकूँ नहीं आता, हर पल लगता है जैसे कोई ख्वाब दाः रही हूँ और अचानक आँख खुले गी तो वीरेंदर मेरे सामने हूँ गे”… मीना के लहज़े मैं सदियों की उदासी थी

“खुद को संभलो मीना, इस वक्त तुम्हाइन अपना ख्याल रखने की बहुत जरूरत है”… अभिनव बात कर के खामोश हो गया. उसके बाद कई लम्हें उसे खामोशी की नज़र हो गये

“मुझे तुम से कुछ कहना है अभिनव”… आख़िर कार मीना ने उसे खामोशी को थोड़ा

“तुम बहुत अच्छे इंसान हो अभिनव. मेरे दिल मैं हमेशा तुम्हारे लिए बहुत इज्जत रही है. मेरी कही हुए बातों का गलत मतलब ना लेना. मैं नहीं चाहती के आज के बाद तुम कभी दोबारा इस घर मैं आओ या मुझसे मिलने की कोशिश करो”

“मगर मीना…”… अभिनव जैसे उसकी बात सुन के तड़प के खड़ा हो गया, मगर मीना ने हाथ खड़ा कर के जैसे उससे कुछ कहने से रोक दया

“तुम जानते हो जिस रात तुम वापस नहीं आए मुझे काफी वक्त तक यकीन ही नहीं आया था के तुम मुझे वहाँ अकेला चोद कर चले गये हो. बहुत रोई थी मैं, समझ नहीं आती थी के जो दर्द मेरे अंदर उठ’था है वो कैसे खत्म होगा. मगर फिर भी एक पल के लिए भी मुझ मैं इतनी हिम्मत नहीं पैदा हुई के मैं अपनी जान ले सकों. तब मैं ये बात अक्सर सोचती थी के वो कोन लोग होते हैं जो मोहब्बत मैं खुद अपनी जान की परवाह नहीं करते, और खुद को जिंदगी की कैद से आज़ाद कर देते हैं. मगर आज मैं ये बात समझ सकती हूँ, अगर मेरे अंदर वीरेंदर का दूसरा रूप ना साँस ना ले रहा होता तो मैं एक लम्हें की देर किये बेघार इस जिंदगी से जान छुड़ा लेती. ये मत समझो के मैं जज़्बात मैं आ कर कोई बात कह रही हूँ. वीरेंदर के ना होने से कुछ बदल नहीं गया, वो मेरे अंदर साँस लायटे हैं, जब तक मैं ज़िंदा हूँ, वीरेंदर सिंग….

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