वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया – 44

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का वजूद भी ज़िंदा है. मुझ मैं ना इतनी हिम्मत है के बार बार खुद को आज़मायोन और ना मैं अब कोई और आज़माइश चाहती हूँ. अब मैं अपनी बाकी की जिंदगी सकूँ से रहना चाहती हूँ, वीरेंदर के साथ, और मुझे अच्छा नहीं लगे गा के तुम बार बार आ कर मुझे वीरेंदर से दूर होने की राहाईण दिखायो. मैंने तुम्हारे लिए हमेशा अच्छा सोचा है, और मेरा यकीन करो इस फैसले से सिर्फ़ मेरा ही नहीं तुम्हारा भी फायदा है. मेरा वजूद अब सिर्फ़ मेरा है, इसके अंदर वीरेंदर के सिवाय और कुछ नहीं, ऐसे खाली और खॉकला वजूद तुम्हारे किसी काम का नहीं अभिनव. मैं दुवा करती हूँ के तुम्हाइन वो साथी मिले जो तुम्हाइन उतनी ही मोहब्बत दे जितनी तुम्हारा हक़ है”… मीना ये कह कर खामोश हो गयी, एक बार से एक तकलीफ-दे खामोशी थी जो उनके बीच बोल रही थी

“चलता हूँ मीना, मगर कोई वादा नहीं करता. अगर तुम्हाइन लगे के तुम ने ये फैसला जल्द-बाज़ी मैं कर दया तो याद रखना के मैं तुम से हमेशा सिर्फ़ दो क़दम के फासले की दूरी पे हूँ”… अभिनव ये कह कर थोड़ी देर के लिए खामोश हुआ जैसे उसके जवाब का इंतिज़ार कर रहा हो मगर मीना खामोश रही तो थोड़ी देर बाद वो उठ कर वहाँ से चला गया. मीना एक लंबी सी साँस ले कर अपनी जगा से उठ खड़ी हुए

“यादव”… उसे ने खड़े होते ही उससे पुकारा

“जी बेगम साहिबा”…हमेशा की तरह यादव किसी कोने से नमूदर हो गया

“अभिनव आज के बाद दोबारा इस घर मैं नहीं आना चाहिये. चौकीदार को कह दो के इससे अंदर ना आने दया जाए”

“मगर बेगम साहिबा”… यादव जैसे कुछ कहना चाहता हो

“यादव”… अपनी आवाज़ सुन कर तो एक पल को मीना को भी झटका लगा, लफ़्ज़ उसके थे मगर लहजा वीरेंदर सिंग का था

“जी हुकुम”… दूसरा झटका मीना को यादव का जवाब सुन कर लगा. इस नाम से तो वो वीरेंदर को बुलाता था हमेशा

“यादव, तुम्हारी पत्नी, उसी फार्म हाउस पे होती है ना जहाँ तुम मुझे पहली बार ले गये थे?”

“जी हुकुम”

“कल जा के उससे ले आना और अंदर शिफ्ट हो जाना. मैं नहीं चाहती के वीरेंदर को जिस इंसान से इतना लगाव था वो इस घर से एक पल के लिए भी दूर हो”

“जी हुकुम”… यादव उसकी बात सुन कर हैरान होता उससे डैखहता रही गया

“वीरेंदर ने कभी तुम्हाइन अपना मुलाज़िम नहीं समझा. बल्कि एक खास हिस्सा थे तुम उनकी जिंदगी का और अब मेरी जिंदगी का भी वही हिस्सा बना’ना है तुम्हाइन. आने वाले दिनों मैं वीरेंदर का दूसरा रूप इस घर मैं आने वाला है तुम्हाइन उसका भी ख्याल रखना है मेरे साथ मिल कर. मेरा भाई बन कर, तुम्हारे होते हुए मुझे किसी और की जरूरत महसूस नहीं होनी चाहिये ना?”… पहली बार मीना ने मुस्कुराते हुए कहा

“बंदा हुकुम का गुलाम है. आप हुकुम कराईं यादव अपनी जान आप पे नीचावर कर देगा”… जज़्बात से यादव की आवाज़ भीग गयी. मीना ने पहली बार उससे इस तरह जज़्बाती देखा था. वो उसके काँधे पे थपकी दे कर वापस अपने कमरे मैं आ गयी

जिंदगी का सफ़र कितना अजीब था, कभी उसे ने सोचा ही नहीं था. बहुत साल पहले मीयर्रा भाई के कोठे पे वो रातों को इस खौफ से नहीं सो पति थी के कहीं रात के अंधैरे मैं कोई आ कर उसके जिस्म को नोंच ना ले. वहाँ से ले कर मीना सिंग तक का सफ़र कैसे गुजरे था उससे पता ही नहीं लगा. उससे समझ नहीं आती थी वो खुद को खुश-किस्मत समझे या बाद-किस्मत. एक ऐसा इंसान उसकी जिंदगी मैं आया जिस ने उससे इतनी मोहब्बत की के आख़िर उसे मोहब्बत ने उसकी जान ले ली. और बहुत साल पहले वो भगवान से शिकायत करती थी के के पूरी दुनिया मैं कोई एक भी ऐसा इंसान नहीं बनाया जो उसे से मोहब्बत करे

बहुत साल पहले एक बार चंदा ने उससे कहा था के तवायफों की किस्मत मैं मोहब्बत नहीं होती. और आज उसका बस चलता तो वो सारी दुनिया को बताती के डैखहो एक तवायफ़ को किसी ने इतनी शिद्दत से चाहा के उसे पे भरोसा ना करने की सजा उसे ने खुद को मौत दे कर अदा की. वो जिस ने उससे एक बार कहा था के कभी उसके दिल मैं ये एहसास पैदा क्या के वो उसे पे भरोसा नहीं करता तो खुद को उसे से बहुत दूर ले जाए गा और कितना सच्चा निकला था वो शख्स. उसे ने जो कहा था वो कर दिखाया, और वो कहता है के किसी और का हाथ थाम लो?. जिस के उप्पर मोहब्बत का बदल इतना खुल के बरसा हो वो क्या बारिश के चाँद कत्रों के लिए तरसे गा?. उसे ने तो उससे इतनी मोहब्बत दे दी थी, के शायद कोई और 7 जन्मों तक भी ऐसी मोहब्बत ना कर पाता उसके साथ, फिर वो कैसे उसे से बेवफाई कर लेती. वो जो समझती थी के वो उससे अपने घर क़ैदी बना के लाया है, उसे ने उससे कैद तो कर दया था मगर अपनी मोहब्बत से. और क्या है मोहब्बत? एक ना खत्म होने वाले दर्द का सिलसिला, या एक ऐसी बारिश जो कुछ पल के लिए उसे पे बरसी मगर हमेशा के लिए उससे नहला गयी

एक दुनिया उससे मीना के नाम से जानती थी, वो मीना जो एक तवायफ़ थी. बाकी दुनिया उसे की किस्मत पे रश्क करती थी के उससे मीना सिंग बना’ने का मोक़ा मिला. मगर कोई ये बात नहीं जानता था के वो तो बस एक आम से लड़की थी, जिससे एक मोहब्बत करने वाला साथी चाहिये था. उसे ने तो बस एक ख्वाब देखा था, एक पूर-सकूँ जिंदगी का. और आज वो क्या समझती? उसे का ख्वाब पूरा हो गया? या बस चाँद लम्हें थे जो मोहब्बत की खैरात मैं उससे मिल गये. मोहब्बत हमेशा ही उसके साथ खेल खैइलती आए थी, और हर बार उससे इस खेल मैं मात हुए थी. मगर अब और नहीं, उससे अब किसी से कुछ नहीं चाहिये था, ना किसी का साथ, ना किसी की मोहब्बत. उसके दिल मैं बस वीरेंदर की मोहब्बत का मौसम आ कर ठहेर गया था, और अब सारी जिंदगी वो इस….

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