वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया – 45 – The End

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मौसम की कैद से बाहर नहीं आना चाहती थी. मीना ने म्यूज़िक प्लेयर पे अपना पासिंदिदा गाना चला दया और आँखें बंद कर के वीरेंदर के ख्यालों मैं खो गयी, अब उससे उन खलयों से बाहर निकलना ना-मुमकिन था

तुझे क्या खबर मेरे हाल की

मेरे दर्द, मेरे मलाल की

ये मेरे ख्याल का सिलसिला

किसी याद से है मिला हुआ

उससे डैखहना, उससे सोचना

मेरी जिंदगी का है फैसला

ये उसी की पलकों के साए हैं

मेरी रूह मैं जो उतार गये

ये जानूं-ए-मंजिल-ए-इश्क है

जो चले तो जान से गुजर गये

जो चले तो जान से गुजर गये

मुझे इस मक़ाम पे चोरना

है ये बेवफाई की एंतिहान

ये क़ाफास हो जैसे खुली फ़िज़ा

यहीं सुख का साँस मैं लूँ सदा

जिन्हें तेरी डीड की प्यास थी

वो कटोरे नैनों से भर गये

ये जानूं-ए-मंजिल-ए-इश्क है

जो चले तो जान से गुजर गये

जो चले तो जान से गुजर गये

जो मेरे नसीब के हरफ़ थे

वो मेरे लिए ना लिखे गये

तेरा हमसफ़र ये दुवा करे

है जहाँ भी खुश तू वहाँ रहे

तेरा साथ चलना महल था

जो रुके तो साँस ठहेर गये

ये जानूं-ए-मंजिल-ए-इश्क है

जो चले तो जान से गुजर गये

जो चले तो जान से गुजर गये

जो चले तो जान से गुजर गये…..
….

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